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Friday, October 11, 2019

असलियत ...!!! (by युगदीप शर्मा)

तेरी आँखों पे ग़ज़लें हज़ारों हुईं,
तेरी नज़रों ने कातिल होने
के इलज़ाम लिये।

तेरी पलकों पे ओस भी कई दफा ठहरी,
तेरे लबों को बहुतों ने जाम कहा।

तेरे रुख में बहुतों को चाँद नज़र आया
तेरी जुल्फों से कई बार घटा बरस गई
तेरे पोरों को किसी ने फूल कहा
तो कुछ ने हथेली पर उठाए पाँव,
कि कहीं जमीं से मैले न हों।

तेरी अँगड़ाइयाँ जंगों का सबब बनी,
तेरो अदाओं से हज़ारों हलकान हुए।
--
जिसने जैसा चाहा, 
वैसा रूप देखा।
किसी ने पूजा, किसी ने चाहा, किसी ने भोगा,
किसी ने मूरत , किसी ने वस्तु,
तो किसी ने तुमको बाजार बना दिया
कभी जंग, कभी कारण, तो कभी हथियार बनी ,

और तुम, खुद भी भूल गयी कि

तुम क्या थी, क्या हो, और क्या होगी।
यही तो माया है। 
महा ठगिनी।

ये सब शायरों के ख्वाब थे,
और कुछ तरीके,
कि तुम भूल जाओ अस्तित्व,
और जी लो , दूसरों ले मुताबिक।

और हाँ,
बराबरी?

हह... भूल जाओ।

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युगदीप शर्मा ( दिनांक ११ अक्टूबर, २०१९ , प्रातः ११ बजे , पुणे में )

आलस - नामा...!!! (by युगदीप शर्मा)

पड़े पड़े अब क्या करें , करना है कुछ काम,
या फिर चद्दर तान के , करें और आराम।
करें और आराम, जब तक न मन अकुतावे,
लेटे लेटे हो जायँ बोर, और चैन न आवै।
कहि भैया कविराय, आलसी वही बड़े,
जो चाहे जो हो जाये, रहें बस पड़े पड़े।।

*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक १० अक्टूबर, २०१९, पुणे में )         


Tuesday, April 2, 2019

फिल्म समीक्षा : दंगल

इस शुक्रवार आमिर खान की नयी फिल्म लगी है।  इसके बारे में पक्ष या विपक्ष में कुछ कहना वैसे तो बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा कुछ होगा। फिर भी उम्मीद है की इसे सिर्फ एक ईमानदार समीक्षा के नजरिये से ही देखा जायेगा।

जैसा की हर उस फिल्म के साथ होता है, जिसमे आमिर का नाम जुड़ा हो, इस फिल्म के प्रमोशन के लिए भी कुछ नए तरह के हथकंडे अपनाये गए। इसमें सबसे प्रमुख तो आमिर का अपने वजन के साथ खिलवाड़ था।  मुम्बइया फिल्मो के लिए यह एक अनोखी चीज है और यही बात अपने आप में सुर्खियां बटोरने वाली साबित हुई। इससे पहले भी ऐसा ही हम 'गजनी' और 'ओम शांति ओम' से पहले भी देख चुके हैं।

दूसरी बात फिल्म का प्रकार है। यह फिल्म एक डॉकू - ड्रामा फिल्म है और इसे मुम्बइया फिल्मो के उस नए और सकारात्मक रुझान की अगली कड़ी कहा जा सकता है, जिसमें खेल, या वास्तविक घटनाओ से प्रेरित फ़िल्में बन रही हैं।  हालाँकि इस तरह की फिल्मों में हर किरदार को पूरी ईमानदारी से उतार पाना बहुत मुश्किल काम है। और अक्सर घटनाओ को सिनेमाई नाटकीयता देने के लिए निर्देशक अपने अनुसार तोड़-मरोड़ देते हैं।

इस फिल्म में विषय, परिवेश और पात्रों को लेकर काफी रिसर्च की गयी है और वो झलकती भी है। यही बात इसे आम मुम्बइया फिल्मों से अलग करती है।  किन्तु यह बात उतनी ही सामान्य होनी चाहिए ही। हर फिल्म के लिए इतनी ही रिसर्च और मेहनत जरूरी है ही। मुम्बइया फिल्मो से तुलना करने पर यह फिल्म एक ख़ास फिल्म जरूर लग सकती है पर समग्र रूप से देखने पर यह एक साधारण फिल्म ही है।

इस फिल्म की हो रही तारीफ को देख कर २ कहावतें इस पर एकदम सटीक बैठती हैं - 'अंधों में काना राजा' या फिर 'बावरे गाँव में ऊँट'।
चुनाव आपका है।  मैं तो इसे ५ में से ३ सितारे ही दे सकता हूँ।  

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युगदीप शर्मा
जनवरी २०१७