Sunday, March 29, 2026

नींव के पत्थर : बाबा स्व० श्री चंद्रपाल शास्त्री जी, की पुण्य स्मृति में

बहुत छोटे थे तब, ठीक-ठीक याद नहीं, पर कुछ दृश्य कहीं किसी कोने में अंकित हैं।
गांव में बहुत हलचल थी।और हम बच्चों की भीड़ में शोर मचाते आगे-पीछे भाग रहे थे। "राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।" "सौगंध राम की खाते हैं ..."।
एक जीप को सजाकर उसके ऊपर यात्रा निकली थी। गाँव के हिसाब से बहुत ही भव्य यात्रा। उसी पर ऊपर बैठे बाबा, दिव्य रूप। प्रसाद बांटते, तिलक लगाते हुए।
उस समय वह केवल हमारे बाबा ही नहीं थे।
राम काज करिबे को आतुर.. बस एक ही धुन .. "रामलला हम आएंगे.. "।
तेलियों के मुहल्ले में एक बड़ा सा नीम का पेड़ था। सेठा व्यापारी के घर के ठीक सामने, गली के दूसरी तरफ, चबूतरे पर। शोभायात्रा यात्रा का ऊंचा गुम्बद, और उसके रास्ते में नीम की एक बड़ी सी डाल। गुम्बद ऊँचा, पर जोश? उस गुम्बद से भी कई गुना ऊंचा। एक दो बार जोर से जय श्री राम के नारे के नारे लगे, और वो डाल नीचे आ पड़ी। जहाँ वो डाल थी, पेड़ पर उस जगह एक बड़ा ठूंठ सा कुछ रह गया था। बहुत बाद तक भी उस ठूंठ को (दूध लेने जाने का वही रास्ता था) आते जाते देख कर अक्सर वह दृश्य याद आ जाता था।
उस यात्रा में जाने कितने दिन बाबा, पापा दोनों बाहर रहे, जुटे रहे। बसों का इंतजाम, जाने वाले लोगों की यात्रा का इंतजाम, पैसे का इंतजाम, पूरे जोश के साथ।
लौटे तो ढांचे की एक ईंट भी लाये थे साथ। पुण्यभूमि में 4-5 शताब्दियाँ.. वह ईंट भी पवित्र हो गई थी शायद।
कारसेवा का अर्थ हमें तब नहीं पता था।
पता था तो बस बाबा के ऊपर उछल-कूद मचाते हुए सुने हुए जेल यात्रा के किस्से। कारसेवकों के किस्से।
एक कैलेंडर भी याद है। [१]
विनय न मानत जलधि जड़.....
समुद्र को रौद्र रूप दिखाते राम, पार्श्व में प्रस्तावित मंदिर का चित्र।
गर्मियों में घर के पीछे के नौहरे में छिड़काव के बाद बाबा की खाट लगती थी। मिलने वाले लोगों का सिलसिला। गांव के किस्से, कहानियां, चर्चाएं। देश, विदेश, धर्म, आचार, विचार सब कुछ समेटे हुए। आखिर थे तो वो शिक्षक ही, आजीवन शिक्षक।
जब लोग कुछ कम हो जाते , तब समय आता था कहानियों का। लोक कथाएं, रामायण, रामचरित मानस से, पौराणिक, पंचतंत्र से कथाएं। और सबसे अंत में- कहानी पोता रानी... चूल्हे की द्यौरानी ....
राम औऱ संघ। बस।
संघ के आव्हान पर जब कश्मीर गए थे, लाल चौक, तिरंगा ले कर। हम तब भी बहुत छोटे थे। झंडा फहराने के मायने नहीं पता थे।
प्रातः स्नान, फिर पूजा पाठ। पूजा में रोज रामचरित मानस पाठ भी। आजीवन।
बुखार 104 - 105°, नहाना मना है, फिर भी, जिद्द। नहाना, फिर पूजा। आखिर राम को कैसे छोड़ दें।
बुखार इतना बढ़ा कि सिर पर चढ़ गया। तमतमाया चेहरा लेकर इधर से उधर चक्कर लगाने लगे - "ये पीयूष कहाँ है? अयोध्या के लिए बसें जानी थीं। लोग अभी तक नहीं आये। और ये ना जाने कहाँ निकल गया।" हम बता रहे थे "बाबा बैठ जाओ। कारसेवा को कई साल बीत चुके हैं। "
हमें कारसेवा का मतलब तब भी नहीं पता था।
"राम तुम मानव हो, ईश्वर नही जो क्या..."[२][३]
सप्तम स्वर में प्रतिदिन, सुबह- शाम, इन्हीं पंक्तियों से शुरू होता था। कभी बहुत चिढ़ भी होती थी। पर शायद हम समझ के उस स्तर पर नहीं थे। अभी भी नहीं हैं।
बाबा... देखो.. देशभर में भाजपा है, अपने दम पर। लालचौक में तिरंगा भी है, 370 खत्म हो गयी।
और हाँ, रामलला आ गए हैं। विराजमान हैं।
उस मंदिर में, नींव में, एक ईंट आप भी हैं।
श्री राम के चरणों में , सदा।
- बाबा, श्री चंद्रपाल शास्त्री जी, की पुण्य स्मृति में
- युग
****
[१ ]. चित्र संलग्न
[२]. राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?
विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या?
तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे;
तुम न रमो तो मन तुम में रमा करे।
[३]. मो सम कौन कुटिल खल कामी।
तुम सौं कहा छिपी करुणामय, सबके अन्तर्जामी।
जो तन दियौ ताहि विसरायौ, ऐसौ नोन-हरामी।
भरि भरि द्रोह विषै कौ धावत, जैसे सूकर ग्रामी।
सुनि सतसंग होत जिय आलस , विषियिनि संग विसरामी।
श्री हरि-चरन छांड़ि बिमुखनि की निसि-दिन करत गुलामी।
पापी परम, अधम, अपराधी, सब पतितन मैं नामी।
सूरदास प्रभु ऊधम उधारन सुनिये श्रीपति स्वामी।।
मो सम कौन कुटिल खल कामी।।
***
बाबा गाया करते थे।
।।जय श्री राम।।




Friday, October 24, 2025

मजहब


धर्म पूछती मजहबी गोलियाँ 
कलावा बाँधे घूमते लकड़बग्घे 
मीनारों से गूँजते युद्ध के साप्ताहिक फरमान 

कुछ गिनती और आंकड़ों में सिमटी हुई,
घटनायें हर रोज,
यहाँ वहाँ 
नकारी जाती हुईं। 

लकड़बग्घों की संख्या 
शतुरमुर्गों के बनिस्पत कुछ भी नहीं 

फिर भी 

शतुरमुर्गों के 
पूरे गाँव के गाँव, 
झटके में खत्म कर;
जिंदगियों को 
आतंक के रेगिस्तान में धकिया 
लकड़बग्घों के जश्न 
तहजीब में गिने जाते हैं 

वहीं नैरेटिवों की 
राह में नुचती हुई , 
घिसटती ज़िंदा लाशें 
यदा कदा मुर्दा खबरों के पन्ने पर, 
एक कोने पर जगह पा 
इतराती हैं । 

राष्ट्रों की संयुक्त सभा 
चिंता व्यक्त करती है 

करोड़ों अरबों की तुलना में 
दो-चार-दस-सौ जिंदगियों का मूल्य 
कुछ भी नहीं 

बस आंकड़े भर हैं 

रपटों में यही आंकड़े 
हर साल बढ़ते हैं 
फिर 
‘रिलीजन’ और ‘मजहबों’ की बिना पर 
‘छुपते’ या ‘छपते’ हैं 

और हम तुम 
अपनी केंचुलों में सुरक्षित 
आंकड़ों की शह पर 
कठपुतलियों सा खेलते हैं 

हजारों सालों से 
बने हुए ढर्रे 
आजमाये हुए पैंतरे 
फिर फिर आजमाये जाते हैं 

और हम 
मोमबत्तियों की रौशनी में 
लहालोट - सम्मोहित 
पहुँच जाते हैं 
ले गर्दनें 
छुरों के बीच 

मजहबी जहान का यही सच है 

- युगदीप (२३-२७ अप्रैल २०२५, रात्रि डेढ़ बजे)
(पहलगाम पर)




 

Tuesday, September 26, 2023

अर्बन नक्सल . .

 काश 

काश तुम में 

थोड़ी  तो अकल होती 

थोड़ा विवेक होता 


तो तुम भी देख पाते 

सच्चाई 

वामपंथी नैरेटिवों से परे 

देख पाते कि जहाँ और भी है 


काश तुम भी जमीन से जुड़े होते 

तो यूँ  वातानुकूलित वातावरण में बैठ 

गरीबी, रोटी , संघर्षों को 

चुराई हुई कविताओं के माध्यम से 

रोमैंटेसाइज नहीं करते,

 

कुछ ठोस काम करते 

धरातल पर 


पर शायद ऐसा नहीं हुआ 

तभी तुम इतने अंधे हो 

कि देश की , समाज की 

सच्चाई देखने से 

रोकती है तुम्हारी 

अर्बन नक्सल सोच 

और कुण्ठा ,

और बस 

लगातार दुत्कारे जाने  बाद भी 

लगे  रहते हो 

समाज को बरगलाने में 

फर्जी ख़बरें बनाने, फैलाने में 

------

काश तुम्हें थोड़ी अकल मिली होती 

काश तुम में थोड़ी समझ होती 


काश

काश

(संलग्न चित्र में लिखी "कविता" के उत्तर में )
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युगदीप शर्मा 
२६ सितम्बर २०२३ दोपहर ०१:३० बजे , गुरुग्राम में 





Friday, March 31, 2023

जय जवान, जय किसान!

 जब किसान बूढ़ा हो जाता है 

और उसके बेटे नाती पोते 

उसकी विरासत संभाल लेते हैं, 

तब उन आँखों की चमक देखी क्या कभी?


उनकी  आँखों में झाँको 

जहाँ भर की हरियाली दिखेगी 


छोटी जोत बड़े कुनबों में 

खेती नौकरी साथ चलती है


खेती नौकरी में भाइयों में

छोटे बड़े का भेद 

-यदि है 

तो 'संस्कारों' की गलती है 

'सरकारों' की नहीं। 


मेरे गाँव में, अभी भी 

होश सँभालते ही 

खेत के पेड़ों से लटकते 

लड़के मिलते हैं, 

लाशें नहीं।  

फ़ौज में जाने का जज्बा ही कुछ ऐसा है।  



चिता को आग देता, फौजी का बाप 

दुसरे बेटे को भी जब फ़ौज में 

भेजने का प्रण करता है 

तब उस माई और भौजाई के आंसू 

उसका सम्बल होते हैं , प्रश्न नहीं!


और मेरे दोस्त, यही सम्बल 

आकाश गुंजा देता है 


'जय जवान जय किसान' से 


पर हाँ 

एक बात तो है- 


जब हम चाँद की बातें करें 

तुम रोटी दिखा देना!

कहें हरियाली बहुत है आज तो  

झुलसते मैदां बता देना 

गर कहे कोई 

कि आज फिर बारिश का मौसम है 

उसे तुम भूख और मजदूर की 

अंतड़ियाँ गिना देना !


वो क्या है कि 

कविता में 

जब तक ये बातें न आएँगी  

कोई कैसे इस क्रांति का 

कविताकार कहायेगा। 


कोई कैसे तुम्हें इस क्रांति का 

कविताकार बतायेगा। 


-- एक टाइमपास तथाकथित कवि 

युगदीप शर्मा 

३१ मार्च २०२३ अपराह्न १२.५५ बजे 

गुरुग्राम में 
तस्वीर में लिखी कविता के जवाब में 



क्रांति

 "क्या चाहिए तुम्हें? 

- क्रांति ?

पर क्यों ? "

"बस चाहिए -

तभी तो हमारा नाम होगा ,

सम्मान होगा ,

कहवा घरों में बैठ कर 

धुंए के छल्लों से  

क्रांति  की पेंटिंग बनाएंगे 


दारु के ठेकों पर 

छलकते  जामों से 

भुखमरी के पैमाने उठाएंगे 


फिर किसी  प्रतिभा को 

क्रांति के सपने दिखा 

झोंक देंगे भट्टी में 


उसी भट्टी की तपिश से 

भुने सिके पॉपकॉर्न खाएंगे। 


और यदि 

उस प्रतिभा का नाम भी 

प्रतिभा ही हुआ 

या लिंग उस आधी आबादी से हुआ 

तब उसे भी झोंक देंगे 

क्रांति की भट्टी में 


निचुड़ जाने तक 

जिसके बदन की तपिश 

बेडरूमों को गरम रखेगी 

जो की क्रांति की पहली शर्त है। "


आओ साथी क्रांति करें !


युगदीप शर्मा - कभी कभी कवि 

३१ मार्च २०२३ प्रातः ११.५५ बजे 

गुरुग्राम 




Wednesday, August 3, 2022

दिमागी खुजलियाँ

आज इसने यह कहा 

कल था उसने वह कहा 

यह कब कहा 

यह क्यों कहा


यह कहा 

वह क्यों नहीं 

जब वह कहा 

तब क्यों कहा 


मैंने कहा 

तूने कहा 

क्या क्या कहा 

कब कब कहा 


क्यों क्यों कहा 

कैसे कहा 

ऐसे कहा 

वैसे कहा 


इस पर तो 

इतना कहा 

उस पर जैसे-

तैसे कहा 


कैसे कहा 

क्यूँकर कहा 


बोला तो 

क्या क्या कहा 

जब चुप रहा 

तो क्यों रहा 


चुप क्यों रहा 

बोला कहाँ ?

बोला जहाँ 

तौला कहाँ ?


उसको ऐसे बोलना था 

इसको ऐसे बोलना था 

हमको ऐसे बोलना था 

सबको ऐसे बोलना था 


उसने जब ऐसे कहा तो 

मैंने उत्तर यूँ दिया 

मैंने जब वैसे कहा 

तो तूने उत्तर क्यों  दिया ?


फेसबुक 

कुश्ती का दंगल, 

व्हाट्सएप्प पर 

है अखाड़ा 

टीवी-योद्धा 

पिल पड़े हैं  

मुंह जुबानी युद्ध है  


बातों के तलवार भाले 

बातों में ही बिजलियाँ हैं 

करना -धरना कुछ नहीं बस 

सब 'दिमागी खुजलियाँ ' हैं 


3 aug 2022, Thursday afternoon 12 pm, in office

Friday, October 11, 2019

असलियत ...!!! (by युगदीप शर्मा)

तेरी आँखों पे ग़ज़लें हज़ारों हुईं,
तेरी नज़रों ने कातिल होने
के इलज़ाम लिये।

तेरी पलकों पे ओस भी कई दफा ठहरी,
तेरे लबों को बहुतों ने जाम कहा।

तेरे रुख में बहुतों को चाँद नज़र आया
तेरी जुल्फों से कई बार घटा बरस गई
तेरे पोरों को किसी ने फूल कहा
तो कुछ ने हथेली पर उठाए पाँव,
कि कहीं जमीं से मैले न हों।

तेरी अँगड़ाइयाँ जंगों का सबब बनी,
तेरो अदाओं से हज़ारों हलकान हुए।
--
जिसने जैसा चाहा, 
वैसा रूप देखा।
किसी ने पूजा, किसी ने चाहा, किसी ने भोगा,
किसी ने मूरत , किसी ने वस्तु,
तो किसी ने तुमको बाजार बना दिया
कभी जंग, कभी कारण, तो कभी हथियार बनी ,

और तुम, खुद भी भूल गयी कि

तुम क्या थी, क्या हो, और क्या होगी।
यही तो माया है। 
महा ठगिनी।

ये सब शायरों के ख्वाब थे,
और कुछ तरीके,
कि तुम भूल जाओ अस्तित्व,
और जी लो , दूसरों ले मुताबिक।

और हाँ,
बराबरी?

हह... भूल जाओ।

*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक ११ अक्टूबर, २०१९ , प्रातः ११ बजे , पुणे में )

आज चलो कुछ और लिखें ...!!! (by युगदीप शर्मा)


कुछ झूठे जज्बात लिखें

या फिर से वो ही बात लिखें।

सदियों लंबी रात लिखें या

जगना बरसों बाद लिखें।


कलमों की चिंगारी से

कागज में लगती आग लिखें

आ चल फिर से कुछ आज लिखें।




गूंगों की आवाज लिखें,

या पंख कटी परवाज लिखें ।

इन शहरी खंडहरों से,

उड़ती इंसानी राख लिखें।


ऊंचे महलों को थर्रा दे,

वह अश्कों के सैलाब लिखें।

आ चल फिर से कुछ आज लिखें।


*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक ८ अक्टूबर, २०१९ , रात्रि ११ बजे , पुणे में )

आलस - नामा...!!! (by युगदीप शर्मा)

पड़े पड़े अब क्या करें , करना है कुछ काम,
या फिर चद्दर तान के , करें और आराम।
करें और आराम, जब तक न मन अकुतावे,
लेटे लेटे हो जायँ बोर, और चैन न आवै।
कहि भैया कविराय, आलसी वही बड़े,
जो चाहे जो हो जाये, रहें बस पड़े पड़े।।

*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक १० अक्टूबर, २०१९, पुणे में )         


Tuesday, April 2, 2019

फिल्म समीक्षा : दंगल

इस शुक्रवार आमिर खान की नयी फिल्म लगी है।  इसके बारे में पक्ष या विपक्ष में कुछ कहना वैसे तो बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा कुछ होगा। फिर भी उम्मीद है की इसे सिर्फ एक ईमानदार समीक्षा के नजरिये से ही देखा जायेगा।

जैसा की हर उस फिल्म के साथ होता है, जिसमे आमिर का नाम जुड़ा हो, इस फिल्म के प्रमोशन के लिए भी कुछ नए तरह के हथकंडे अपनाये गए। इसमें सबसे प्रमुख तो आमिर का अपने वजन के साथ खिलवाड़ था।  मुम्बइया फिल्मो के लिए यह एक अनोखी चीज है और यही बात अपने आप में सुर्खियां बटोरने वाली साबित हुई। इससे पहले भी ऐसा ही हम 'गजनी' और 'ओम शांति ओम' से पहले भी देख चुके हैं।

दूसरी बात फिल्म का प्रकार है। यह फिल्म एक डॉकू - ड्रामा फिल्म है और इसे मुम्बइया फिल्मो के उस नए और सकारात्मक रुझान की अगली कड़ी कहा जा सकता है, जिसमें खेल, या वास्तविक घटनाओ से प्रेरित फ़िल्में बन रही हैं।  हालाँकि इस तरह की फिल्मों में हर किरदार को पूरी ईमानदारी से उतार पाना बहुत मुश्किल काम है। और अक्सर घटनाओ को सिनेमाई नाटकीयता देने के लिए निर्देशक अपने अनुसार तोड़-मरोड़ देते हैं।

इस फिल्म में विषय, परिवेश और पात्रों को लेकर काफी रिसर्च की गयी है और वो झलकती भी है। यही बात इसे आम मुम्बइया फिल्मों से अलग करती है।  किन्तु यह बात उतनी ही सामान्य होनी चाहिए ही। हर फिल्म के लिए इतनी ही रिसर्च और मेहनत जरूरी है ही। मुम्बइया फिल्मो से तुलना करने पर यह फिल्म एक ख़ास फिल्म जरूर लग सकती है पर समग्र रूप से देखने पर यह एक साधारण फिल्म ही है।

इस फिल्म की हो रही तारीफ को देख कर २ कहावतें इस पर एकदम सटीक बैठती हैं - 'अंधों में काना राजा' या फिर 'बावरे गाँव में ऊँट'।
चुनाव आपका है।  मैं तो इसे ५ में से ३ सितारे ही दे सकता हूँ।  

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युगदीप शर्मा
जनवरी २०१७