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Thursday, September 3, 2015

फिर चलता हूँ...!!! (by युगदीप शर्मा)

फिर चलता हूँ...!!

कुछ अपनों से
कुछ सपनों से
थोड़ा बतिया लूँ,
फिर चलता हूँ.
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

बहुत दिनों से
दौड़ रहा था
लक्ष्य हीन सा
बेफिकरा सा
सपनों के
टूटे रेशों से
फुरसत के कुछ
पल बुनता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

जीवन की
आपा धापी में
जाने कितने
पीछे छूटे
जिनके बिन था
जीना मुश्किल
ऐसे कितने नाते टूटे

उन रिश्तों को
उन नातों को
उन लम्हों और
उन यादों को
कण- कण सँजो लूँ
फिर चलता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ
****************
युगदीप शर्मा (३-४ अगस्त रात्रि १२ बजे २०१४) (फाइनल ड्राफ्ट ३ सितम्बर २०१५ प्रातः ९.३० बजे, स्लोवाकिया में)

Thursday, April 9, 2015

मौसमों के मायने...!!!(by युगदीप शर्मा)

लोग
जिनके लिए बरसात की रातें
रूमानी नहीं होतीं।

लोग
जिनके लिए बरसात का मतलब
टपकती छतों या गीली लकड़ियों से बढ़ कर
कुछ नहीं होता।

लोग
जो काट देते हैं रातें
टांगों के बीच बाल्टी रख
छतों से टपकता सैलाब कैद करने को
और सो जाते हैं बेखबर
बिस्तर के उस एक कोने पर
जो कम गीला है।

लोग
जिनके लिए सर्दियों का मतलब
उन शूलों से है
जो
कम्बलों और गूदड़ियों के
छेदों से निकल
भेदते रहते हैं उनके कंकाल

लोग
जिनका हर दिन,
रात काटने की तैयारियों में
और रातें
दिन की उम्मीद में गुजरती हैं

उनकी सर्दियां गुलाबी नहीं
स्याह होती हैं।

लोग
जो हमारे अन्नदाता हैं
जिनके बनाये लत्ते पहन,
जिनकी बिछायी छतों की छाँव में
हम जिनके भाग्यविधाता होने का
दम्भ भरते हैं।

उन लोगों को
लू के थपेड़े सच में बहुत राहत देते हैं।
*****************
युगदीप शर्मा (दिनाँक- १५/१६ मार्च २०१५ रात्रि १२.११ बजे ) (फाइनल ड्राफ्ट - ८/९ अप्रैल २०१५ रात्रि १:४० बजे)

Wednesday, April 24, 2013

बाजार.. !!! (by युगदीप शर्मा)


मैं..
निकाल कर रख देता हूँ
सब कुछ ...
अपना ....पराया...
जो कुछ भी है...नहीं है...
मेरे हिस्से के
सपने..
अरमान..महत्वाकांक्षाएं ....
मजबूरियां..
बेबसी...लाचारियाँ..
निकाल देता हूँ सब कुछ .
भूख...प्यास...
गुस्सा ..अपमान ...
इर्ष्या..घृणा
सजा देता हूँ शोकेस में...
किसी मझे हुए सेल्समैन की तरह...
रख देता हूँ सब कुछ...
बाजार में ..

और अंत में...वो  पूछते हैं ..."नया क्या है??"

शायद मैंने  अपने शैतान को नहीं निकाला अब तक...!!!
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युगदीप शर्मा (२४ अप्रैल-२०१३)