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Wednesday, November 16, 2016

जब झाँका कियेँगे हम...!!! (by युगदीप शर्मा)

जब भी मिलूंगा तुमसे
उस ढलती सांझ तक
और उस से परे भी

घनी रात का कलुष
धुल जायेगा
प्रेम की फुहारों से
मेरा और तेरा रंग
घुल जायेगा
करने नयी सृष्टि

और फिर
जहाँ दिन - रात मिलते हैं
धरा-आकाश सिलते हैं
वहाँ
उस दूर क्षितिज के परे से
झाँका कियेँगे हम  (अपने भूत में)
देखने वो अद्भुत रंग
जो हमने मिलके बनाया था !      
*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक ४ अक्टूबर, २०१६, दोपहर १२:५१ बजे)              

{उसी दिन दोपहर ११:५७ बजे व्हाट्सएप्प पर भेजी हुई इस कविता के जवाब में:

स्याह काला अँधेरा मेरा
सफ़ेद खिलती चांदनी तुम्हारी...
गरजता घना बादल मेरा
दूधिया सावन की फुहार तुम्हारी....
मंजूर हो अगर बटवारा ये
तो दिन का उजाला लेके
मुझ रात में मिल जाना ..
जो ढलने लगेगी सांझ मिलने पे तेरे..
मैं भी मिलूंगी तुझे उस सांझ के ही परे...
copied        }

Wednesday, September 7, 2016

दूसरा खत...!!!

दूसरा खत...!!!

फिर कुछ प्रश्न उठे हैं मन में.
मन थोड़ा आंदोलित  भी है।
जिसको हमने साथ बुना है,
क्या वो बस एक सपना ही है?

हरदम मैं सच ही बोलूंगा,
वचन दिया है मैंने तुमको
कुछ शंका हो, निर्भय पूछो,
इस रिश्ते में सच्चाई है।

मुझे भरोसा है तुम पर
तुमको भी उतना ही होगा,
'अगर-मगर' दुनिया पे छोडो
बाकी सब कुछ अपना ही है

रिश्तों के जुड़ने से पहले,
शंकाएं भी स्वाभाविक हैं,
परिवारों को जुंड़ने दो, आखिर,
हम दोनों को जुड़ना ही है।

तू मेरे एहसासों में है
फिर ये इतनी दूरी क्यों है?
इस दूरी को कुछ काम कर दें
आखिर तो हम को मिलना ही है।

नहीं करूँगा वादे तुमसे
चंदा- फूल - सितारों के,
पर, हाँ हरदम साथ चलूँगा,
ये बिन बोला, पर, वादा ही है।



*********
युगदीप शर्मा ( दिनांक - ४ सितम्बर २०१५, दोपहर १२:३५ बजे )

तीसरा खत...!!!

आओ हम तुम कृष्ण बन जाएँ!!

आज जन्माष्टमी है,
उत्सव है कृष्ण के जन्म का,
कृष्ण -
जो प्रतीक थे प्रेम का,

वो छल भी जानते थे,
झूठ भी बोलते थे
किन्तु
वह भी अलौकिक हो जाता था
जब वह छल या  झूठ
प्रेम के वशीभूत हो होता था
वह प्रेम मानव मात्र के लिए प्रेम था

प्रेम,
बहुत बार
बहुत तरह से
परिभाषित किया गया है,
लोगों ने बहुत से लांछन भी दिए हैं इसे.
इसे सर्वोच्च स्थान भी दिया है,
पर शायद इसे गुना बहुत कम है.

आओ हम तुम गुन लें इसको
बन जाएँ हम स्वयं कृष्ण
बाधाएं बहुत सी होंगी ही
कृष्ण बनना आखिर
इतना भी आसान नहीं है.

दैहिक लौकिक जगत से परे,
यदि कर पाये प्रेम,
जन्म कर्म के बंधन से मुक्त
सिर्फ प्रेम रहेगा इस जग में,
शुद्ध प्रेम,
जिसकी कोई सीमा नहीं होगी.
तब शायद हम खुद ही कृष्ण बन पाएं।

आओ हम तुम कृष्ण बन जाएँ!!
******
युगदीप शर्मा (दिनांक- ५ सितम्बर, २०१५, प्रातः ९:३८ मिनट, स्लोवाकिया में)

तुम बिन...!!!

नहीं जी सकता, मैं तुम बिन अब।

तुमसे जब बातें करता हूँ
कुछ पागल सा हो जाता हूँ
बिना बात क्या क्या कहता हूँ
ख़ामोशी में धड़कन सुनता हूँ

यही सोचता हूँ बस हरपल
बाहों में लूंगा तुमको कब?

नहीं जी सकता, मैं तुम बिन अब।।

तुम्हे रूठना और मनाना
तुमसे हर पल प्यार जताना
बिन बोले सब कुछ कह जाना
तुमको अपनी जान बुलाना

इन सब तरकीबों, बातों से
पूरा प्यार व्यक्त हुआ कब?

नहीं जी सकता, मैं तुम बिन अब।।

कितना प्यार तुम्हे करता हूँ
एक अंश भी गर कह पाऊं
जितने जग में कागद पत्री
उनको भी गर लिख, भर जाऊं

वो सब भी कम पड़ जायेंगे
भाव व्यक्त करूँगा मैं जब।

नहीं जी सकता, मैं तुम बिन अब
*****
युगदीप शर्मा (१६ फ़रवरी २०१६, सायं ८:०० बजे)

आज फिर...!!

कनखियों से झांकती
नन्ही सुबह का रूप देखा
ज्यों क्षितिज पे बादलों ने
टांक दी हो स्वर्ण रेखा.

आज फिर उसकी नजर ने
इस नजर को हँस के देखा।

आज फिर से चंचला सी
तितलियों ने की शरारत
पलकें उसकी झुक गयीं यूँ
देख उनकी ये हिमाकत
....
देख उसकी ये नजाकत/nafasat
....
....

कुछ झिझकती बारिशों ने
आज फिर तन मन भिगोया
ज्यों थिरकती बूंदों ने हो,
मगन मन मोती पिरोया
आज फिर उन गेसुओं में,
उलझ दिल का भ्रमर खोया


आज फिर कुछ बावरे से
बादलों की छाँव ठिठकी
ज्यों उन्हें चंचल पवन ने
दी हो मीठी एक झिड़की
आज फिर उसकी अदा को
देख मेरी जान थिरकी


आज फिर उसकी हंसी ने,
इस जहाँ का दुःख समेटा

आज फिर उसकी नजर ने
इस नजर को हँस के देखा।
*****
युगदीप शर्मा (१२ अगस्त २०१३) (फाइनल ड्राफ्ट - ७ सितम्बर २०१५ स्लोवाकिया में)

Sunday, November 1, 2015

भूख और स्वाभिमान...!!!

"वो एक बेचारा भूख से मर गया"
"नहीं नहीं स्वाभिमान से मरा है…
भूख से कोई नहीं मरता"
"आदमी भूख से नहीं मरता ?"
"नहीं... स्वाभिमान से मरता है"
"हाथ फैला सकता था किसी के आगे
पर नहीं ..
मर गया ..
चोरी कर सकता था "
"अगर पकड़ा जाता तो? "
"तो पिटाई से मरता
भूख से नहीं "

"खैर छोड़ो..
आज डिनर का क्या प्रोग्राम है?"
"फोर सीजन्स चलें क्या? वहां San-Qi का खाना अच्छा है !"
************
युगदीप शर्मा (दिनांक १५ मार्च २०१४)

Thursday, September 3, 2015

फिर चलता हूँ...!!! (by युगदीप शर्मा)

फिर चलता हूँ...!!

कुछ अपनों से
कुछ सपनों से
थोड़ा बतिया लूँ,
फिर चलता हूँ.
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

बहुत दिनों से
दौड़ रहा था
लक्ष्य हीन सा
बेफिकरा सा
सपनों के
टूटे रेशों से
फुरसत के कुछ
पल बुनता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

जीवन की
आपा धापी में
जाने कितने
पीछे छूटे
जिनके बिन था
जीना मुश्किल
ऐसे कितने नाते टूटे

उन रिश्तों को
उन नातों को
उन लम्हों और
उन यादों को
कण- कण सँजो लूँ
फिर चलता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ
****************
युगदीप शर्मा (३-४ अगस्त रात्रि १२ बजे २०१४) (फाइनल ड्राफ्ट ३ सितम्बर २०१५ प्रातः ९.३० बजे, स्लोवाकिया में)

Thursday, April 9, 2015

मौसमों के मायने...!!!(by युगदीप शर्मा)

लोग
जिनके लिए बरसात की रातें
रूमानी नहीं होतीं।

लोग
जिनके लिए बरसात का मतलब
टपकती छतों या गीली लकड़ियों से बढ़ कर
कुछ नहीं होता।

लोग
जो काट देते हैं रातें
टांगों के बीच बाल्टी रख
छतों से टपकता सैलाब कैद करने को
और सो जाते हैं बेखबर
बिस्तर के उस एक कोने पर
जो कम गीला है।

लोग
जिनके लिए सर्दियों का मतलब
उन शूलों से है
जो
कम्बलों और गूदड़ियों के
छेदों से निकल
भेदते रहते हैं उनके कंकाल

लोग
जिनका हर दिन,
रात काटने की तैयारियों में
और रातें
दिन की उम्मीद में गुजरती हैं

उनकी सर्दियां गुलाबी नहीं
स्याह होती हैं।

लोग
जो हमारे अन्नदाता हैं
जिनके बनाये लत्ते पहन,
जिनकी बिछायी छतों की छाँव में
हम जिनके भाग्यविधाता होने का
दम्भ भरते हैं।

उन लोगों को
लू के थपेड़े सच में बहुत राहत देते हैं।
*****************
युगदीप शर्मा (दिनाँक- १५/१६ मार्च २०१५ रात्रि १२.११ बजे ) (फाइनल ड्राफ्ट - ८/९ अप्रैल २०१५ रात्रि १:४० बजे)

Wednesday, February 13, 2013

एहसास..!! (by Yugdeep Sharma)

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो नैनों से बतियाना,
वो बलखाना, वो शरमाना,
बिन हिले लबों के चुपके से,
दिल ही दिल में, सब कह जाना.

हाथों में ले हाथ, कभी सकुचाते हुए,
हर आहट पे तेरा सिहर जाना,
तेरा वो हर इक पल, हर इक लम्हा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो नयी सुबह अलसाई सी,
कुछ थकी हुई, घबराई सी,
तेरा वो अंगड़ाई, लेकर उठना,
बिस्तर कि हर सलवट को,
हाथों से ढंकना,

उंगली से लटें
सुलझाते हुए,
दायें ले जाकर, सिर को
हलका सा झटकना,
मुसकाती हुई, तिरछी
नज़रों का फिर इठलाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो अंतिम पल तेरी विदाई का,
तेरी पलकों से आंसूं ढलक आना,
मेरा गुस्सा, बेबसी, लाचारी,
दिल का रोना, होठों का मुसकाना,
साँसों में तूफां सुलगता सा,
वो दर्द अजब सा चुभता सा,
वो, पल में दुनिया-
आँखों में फिर जाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.
**************
युगदीप शर्मा (२५ मई-२०११, रात्रि ९:०० बजे)
correction date: 13/02/2013

बुद्ध..!!! (By Yugdeep Sharma)


याद है? जब पहले पहल मिली थी तुम,
बगल से एक मुस्कान के साथ गुजर गयी थी.
एक परफ्यूम की गंध के साथ
साँस में बस गयी थी तुम
तब ना कोई हवा चली थी,
ना कोई वोइलिन बजी थी.

देखा था मैंने तुझे, पलट कर जरूर,
जैसा कि मैं हर बंदी को देखता था.
क्या पता था कि वही तुम,
एक दिन आ मिलोगी मुझे,
सपने के जैसे, पलकों पे बैठ जाओगी.

दोबारा कब मिले थे, अब ये तो याद नहीं,

पर हाँ, वो एहसास
अभी भी गुदगुदा जाता है अक्सर,
शायद तुमने कुछ कहा था और मैं,
आँखें फाड़ फाड़ के देख रहा था तेरे चहरे को.


फिर जब तुमने फिर से कहा था तो,
हडबडाकर कुछ तो बोला था मैं भी..
और तुम फिर से मुस्कुरा के,
चली गयी थी...फिर से मिलने को..
वो दिन-
उसे तारीख कहूँ तो तौहीन होगी उन लम्हों की ..
-गुजरा नहीं है आज तक...
अटक गया है कहीं...कलेंडरों से परे.


फिर
ना जाने कब.. सब कुछ बदल गया...
आहिस्ते आहिस्ते...
बिना कुछ बोले भी..
जो आज तक कायम है..

बहुत सी बातें...जो तुमने कभी बोलीं ही नहीं..
बरबस ही सुन लिया करता हूँ मैं.
और तुम भी तो समझ लेती हो हर बात को..
अनकहे ही..

भाषा के मायने बदल गए हैं.. शायद...
पंख फैला लिए हैं उसने...
एहसासों को सुनने लगी है वो अब...
आँखों से बतियाती है...
शब्दों/ ध्वनियों की मोहताज नहीं है वो..


तुम्हारे साथ...हर एक पल...
एक जमीनी एहसास है...
बादलों के पार नहीं पहुँचता कभी भी ..
बहुत मजबूत हैं पांव उसके...या कि शायद जड़ें हैं.
जो कहीं गहरे तक, समेटे हुए हैं मुझे..


तेरे साथ होने पर...हर गम, हर ख़ुशी...
अपने मायने बदल देती है...
सब कुछ नया नया सा लगता है..
सारी सृष्टी झूमने लगती है इर्द-गिर्द...
इच्छा/आशा/अभिलाषा/महत्वाकांक्षाओं से परे...
शायद...बुद्ध बन जाता हूँ मैं!!
*********************
युगदीप शर्मा (१३ फरवरी, २०१३)

Wednesday, January 23, 2013

कशमकश..!! (by Yugdeep Sharma)


ये सामाजिक मर्यादाएं,
कैसे तोडूँ, कैसे छोडूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

कर-कर गिनती हार गया मैं,
रिश्तों में इतनी गांठें हैं,
जिनको हम अपना कहते थे,
उन अपनों ने ही ग़म बांटे हैं.
ये रिश्तों की अ-सुलझ गांठें,
कब सुलझाऊं, कैसे खोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

तुमसे पूछा- साथ चलोगी?
उत्तर में फिर प्रश्न मिले,
प्रश्नों को हल करने बैठा,
तो कुछ मुर्दा जश्न मिले.
फिर तुम्ही बताओ इन प्रश्नों का
हल किस पोथी पुस्तक में खोजूं?
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

अब तक चेहरे बहुत पढ़े हैं,
पर तेरे भाव समझ ना पाया,
जितना गहरे उतर के देखा,
उतना घना अँधेरा पाया,
सारे दीपक बुझे पड़े हैं,
मैं किस-किस दीपक को लौ दूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

जीवन में अगणित दुविधाएं,
लंगर डाले पड़ी हुई हैं,
हर ओर घना तूफ़ान मचा है,
जीवन तरणी फंसी हुई है,
फिर इन जीवन झंझावातों में
तुम्ही बताओ क्यूँ ना डोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!
******************
युगदीप शर्मा ( दि०: २३ जनवरी, २०१३)

Monday, October 29, 2012

अनवरत...!!! (by युगदीप शर्मा)


मैं तुझे समेटे रखता हूँ समंदर के जैसे
पर कुछ लम्हों की भाप उड़ ही जाती है
कहीं नजर छुपा कर
और दौड़ने लगती है बादलों की तरह

और फिर
इसी तरह निकल पड़ते हैं
कुछ धूप-छाँव के सिलसिले
जिन पर कभी-कभी कुछ
शामें ठहर जाया करती हैं

चंद पलकों के धुंधलके
जम जाते हैं
एक सर्द रात की शक्ल में
तब जिंदगी किसी ग्लेशिअर में
रुकी बर्फ की तरह सर्द लगने लगती है

फिर कभी जब तेरी
यादों की धूप में
पिघलने लगती है
तो लेने लगती है नदी का रूप

इसीलिए फिर खुद को
समेटने लगता हूँ
एक बाँध की तरह
पर तू
न जाने कहाँ से निकल पड़ती है

रास्ते में कहीं उफन पड़ती है
बारिशों के साथ मिलकर
बहा ले जाने मुझे

और अंत में जा मिलती है
समंदर से ही

और
यही सिलसिला
चलता आ रहा है
अनंत काल से
अनवरत ...
*************
युगदीप शर्मा (२५ अक्टूबर, २०१२)

(English Translation )
I...Like an Ocean..,
try to contain you,
but steams of few moments...
blow away..
stealing my eyes ....
And starts to run like clouds ....

And then starts a play...
of some sun and shadows ..
on which occasionally ,..
some Evenings used to rest.....

freeze like a chilled night ....
some Twilight Eyes...
And then,
as a cold Glacier ice..
life seems to be deposited

and, When...
Starts melting it again...
the sun of your memories...

takes place there ...a river

So,I starts winding up
sometimes like a dam..
but, again...out of nowhere ...
you emerge

and start conspiring,
with pouring rain..
to flood me out,
and blow me away...

And, merge in the ocean ...
you again ....and finally...
And this.. consecution ..
's been going on ...

from eternity ....
continuously ...
ceaselessly.....
**************
Yugdeep Sharma (25 October, 2012)

Monday, October 1, 2012

बारिश!!! (by युगदीप शर्मा)


(You can see the English translation below:)

बहुत बारिश हो रही है बाहर..
और वो बैठे , हाथों में जाम लेकर,
शायराना अंदाज में, पकौड़ियाँ खा रहे होंगे..

पर आज.. बहुत से घरों के बाहर बैठे कुत्ते,
भूखे ही भौंकते रहेंगे!
वो घर जिन्हें डीजल से.. या
रसोई गैस से कभी साबका
नहीं पड़ा.. आज तक!

वो घर, जिनके लिए.. जंगल से बीनी
लकडियाँ भी गीली हो गयीं...और

आज वो लोग बना रहे होंगे
उस सीली हुई लकड़ी के,
धुंए में ही रोटी की शक्लें.

और शायद उन्ही रोटियों को,
अपने दीदों* से निकलती,
बारिशों के साथ निगल कर ,
सो रहेंगे..अगली सुबह तक
टपकती छत से बेखबर !!

और..उधर वो अपनी खुमारियों
का जश्न मना रहे होंगे...
शायद..मुद्रास्फीति की दर को
घटा-बढ़ा रहे होंगे !!!

*दीदे = आँखें (शायद यह शब्द बृज-भाषा में 'दीदार' शब्द से आया होगा कभी.. )
*************
युगदीप शर्मा (१ अक्टूबर- २०१२ ई० प्रातः १:४८ बजे)


English Translation:
---------------------
Rain..!!! (by Yugdeep Sharma)

It's raining heavily.. outside..
And they would be sitting,
having wine in their hands,
must be eating dumplings ..

but, Today the dogs sitting outside..
those houses,
will bark in hunger!

The houses, who never.. ever had
came to know about,
diesel or LPG!

the houses, for whom,
the timber collected from woods
became too wet ...to light their stoves..

They would be making ​​today
the faces of the breads
in the fumes/smoke..
from that wet wood;

And maybe... ;
they will swallow..those loaves
with the rain ..
Emanating from their eyes
and will sleep..
until the next morning
Regardless of leaky roofs!!

And there...
they must have been celebrating ..
their hangover...
playing with the Inflation rate!!!
**************
Yugdeep Sharma (1-oct,2012, @ 1:48 am)


Thursday, September 20, 2012

शिवोहं, शिवोहं, शिवोहं!!! (by युगदीप शर्मा)

(You can see the English translation below:)

तुमने कहा  था..  कि   लड़ाई  होगी ...
क्रांति  का  नाम  भी दिया  था  उसे ...
लेकिन  वह  तो  बस ..
सिमट  कर  रह  गयी  चाय  की  चुस्कियों  में ...
कुछ  ने  उसे  सिगरेट के धुओं  में  उड़ा दिया ..

सुबह  के  अखबार में ...
जो  खबर  छपी थी ...
उसमें बासी रोटियाँ लपेट  कर
रख दी थीं कटोरदान  में ..उन्होंने.
कुत्तों  को  खिलाने  के  लिए..

लोगों  का  गुस्सा  भी  निकला  था ...
सड़कों  पे  गिज-गिजाती  नालियों  की  तरह
लेकिन  वह  तो  लोगों  का  अंदाज  था
छुट्टियां  बिताने  का ..
कुछ  तूफानी  करने  का ..

शायद  समझ  नहीं  पाए  होगे  तुम ...
और  लड़ने  चल  दिए ...

यह  भी  कोई  बात  हुई ...आखिर  ??

अपनी  औकात  भूल  कर ..
ललकारने  चले  थे .. उस बेचारे हाकिम  को
जो  वहां   बैठा  ऊँचे  तख्तों  पे ..
देख  पाता है  तो  बस  लोगों  के  थोबड़े ...
रिरियाते हुए ..घिघियाते हुए..
निगाहें  जमीं  तक  पहुँचने  ही नहीं देते  तुम  लोग ...


अभी  तक ...
तुम्हारी  तशरीफ़  में  बस  4 डंडे # थे ...
और  तुम  पांचवें##  की  बात  करते  थे . ..
आखिर किसी बात की इक हद भी होती है...
और तुम उसको फलांग कर
हाकिम के गिरेबान तक पहुँच गए...

वह तो खैर मनाओ कि राजा ने
नहीं कुचलवा दिया तुम्हे...हाथी के पैरों से..
वर्ना तुम तो थे ही इसी लायक.


बात  करते  हो ...

बस !!
बहुत  हुई  बातें  तुम्हारे  ईमान  की ...
तुम्हारे  ढकोसले ..तुम्हारे  सिद्धांत  की

कहीं  दफना दो या जला दो उन्हें..फिर
तन से लपेट कर वह भस्म बन जाओ  शिव..
और  पीलो  विष ...चले  जाओ  योग  निद्रा  में ...
वही अच्छा रहेगा तुम जैसों के लिए..**



# लोकतंत्र के ३ स्तम्भ और चौथा मीडिया
## जनलोकपाल
**यहाँ शिव के तांडव रूप का जिक्र नहीं है, क्यूंकि अहिंसा के पुजारी तांडव के बारे में सोच भी नहीं सकते !
किन्तु शायद हाकिम को उसी का इंतज़ार है!!

**************************
युगदीप शर्मा (दिनाँक - २० सितम्बर, २०१२)



I wrote a poem ... dedicated to 'Team Anna':

Shivoham, Shivoham, Shivoham!!! (I am The Shiva, I am The Shiva, I am The Shiva)
------------------------------------

You said .. "there'll be fight" ...
you gave it a name of revolution too ...
But it just got..
confined in few morning sips of tea ...
or they blew it away in cigarette fumes..

The news in
the morning news paper
was used by them
to wrap stale breads..
To feed the street dogs ..

Public anger turned out too...
like the dirty drainage running open on the streets
But that was their way ...
to celebrate Holidays ..
to do some stormy..

but You probably didn't understand ...
And started to fight for them ...

what was the matter with you?? were you insane?

you Forgot your place ..
and started to challenge the poor king ..
who sittes on the high throne ..
and Just can see the faces of peoples..
servile and cringed ...
you guys..don't let drop his gaze towards earth/reality...

till now...
you were already having 4 bamboos** up in your ass ...
but you started talking about 5th*** one...
enough is enough!
There is a limit for every thing...
but you crossed that limit..
and grabbed his(The Poor King's) collar ...

Thank God that the King
didn't crushed you by the elephant..
else... you well deserved that.

it's enough!
your honesty...
Your sham .. your principles

Somewhere bury them or Burn them .. and then
apply that ashes to your body, and become Shiva
Drink the poison ...or go to hibernation (by yoga) ...
That'll be much better for someone like you ..###


** 3 columns of constitution and 4th is media
*** Jan lokpal
### Here i am not talking about the angry face (Taandav) of lord Shiva..because the followers of peace/Non-voilance (Ahimsa) can't even think about Voilance..
But it seems the king is waiting fir that only...
**********************
Yugdeep Sharma (Updated - September 20, 2012)

Sunday, June 3, 2012

मैं चाहता हूँ....by युगदीप शर्मा- (25-26 जनवरी, 2004)


(भाग - १ ...)

मैं चाहता हूँ इस धरा को,
स्वर्ग से आगे बढ़ाना;
इस जगत को स्वप्न से, 
बढ़ कर कहीं बेहतर बनाना.

                       मैं चाहता हूँ की यहाँ,
                       हर रात दीवाली मने;
                       हर दिवस-वासर यहाँ,
                       शाश्वत पुनीत होली रहे.

मैं चाहता हूँ अश्रु-कण,
दृग में किसी के हों नहीं;
चारो तरफ सुख-शांति हो,
दारिद्र-दुःख ना हो कहीं.

                       मैं चाहता हूँ जन-जन ह्रदय,
                       उल्लास का संचार हो;
                       हर मनुज परिपूर्ण हो,
                       मधु से मधुर संसार हो.

मैं चाहता हूँ इस धरा पर,
रण का नहीं अस्तित्व हो;
श्रेष्ठता के उत्कर्ष पर,
हर व्यक्ति का व्यक्तित्व हो.

                      मैं चाहता हूँ जड़ता मिटे,
                      नव चेतना का वास हो;
                      ज्ञान का दीपक जले,
                      अज्ञान कीट का नाश हो.

मैं चाहता हूँ हर द्विपद ,
उल्लास से परिपूर्ण हो;
ज्ञान की गंगा बहे,
राम-राज्य संपूर्ण हो.

(भाग -२...)

किन्तु...

सोचने से स्वप्न सब,
साकार हो सकते नहीं;
कर्म और कर्त्तव्य पालन,
स्वप्न से बढ़ कर कहीं.

                      अतः मेरे स्वजन बंधुओ,
                      आज ही संकल्प लें;
                      वसुंधरा उत्थान हेतु,
                      आज ही यह प्रण करें-

"मैं बढूँगा लक्ष्य पथ पर,
हर स्वप्न को साकार करने;
इस धरा को स्वर्ग से, 
आगे नहीं तो स्वर्ग करने."

                      "हे मातृभूमि आशीष दे,
                     यह प्रण हमारा पूर्ण हो;
                     नव-जागरण के नाद से,
                     यह अश्व-मेध सम्पूर्ण हो."
*** युगदीप शर्मा ***
(25-26 जनवरी, 2004)

Monday, May 28, 2012

मनुष्य और पर्यावरण....Part-1 (by Yugdeep Sharma)


ईश्वर ने सोचा होगा ,
संसार बनाने से पहले;
इक सुन्दर सा जगत बनाऊं ,
हरियाली चादर पहने।

स्वछंद विचरते जीव जहाँ पर,
चहुँ दिश जहाँ खुशहाली हो;
नदियों झीलों तालाबों में,
झिल-मिल बहता पानी हो।

हर वन उपवन फूल महकते ,
डाल-डाल पंछी गाते;
कल-कल कर बहते झरने,
बादल पानी बरसाते.

उसने रेगिस्तान बनाये,
स्वर्णिम-मृदु-कालीन बिछाई;
सूरज की उगती किरणों ने,
जीवन की नव-ज्योति जगाई।

पर्वत-पर्वत, वादी-वादी,
जीवन था चहुँ-ओर खिला;
कुछ दुरूह-पर्वत-श्रृंगों को,
हिम-रूप-रजत उपहार मिला।

नदियों ने मिट्टी को सींचा,
मिट्टी ने जीवन-अन्न दिया;
पेड़ों-पौधों-औषधियों ने,
प्राण-वायु प्रदान किया।

सागर ने बादल बरसाए,
मेघों ने जल दान किया;
पवन बही रस-सुगंध लिए,
जिसने जगती को प्राण दिया।

पारस्परिकता, सह-जीविता,
जैव-संतुलन अद्भुत था;
सुन्दर जीवन चक्र बनाया,
जड़ पर चेतन की निर्भरता।

हर जड़-चेतन ने सिर्फ दिया,
ईश्वर के इस भूमंडल में;
था त्याग बस त्याग मिला,
इस जगती के कण-कण में।

*****  युगदीप शर्मा *****
(08/03/2010 @ 10 pm)