Sunday, April 13, 2014

सच्चाई... !!! (by युगदीप शर्मा)

एक दौर था जब ,
हर बंद पलक के साथ,
आँखों में तुम्हारा
चेहरा फिर जाता था

अकेली अँधेरी रातों में
छत से झूलते पंखे पर
तुम्हारी शक्लें ढूँढा करता था

तुम मेरा अस्तित्व बन गयी थीं
तुम्हारे बिना ...
सोच भी नहीं सकता था
जिंदगी गुजार लेने का

पर अब.... इतने बरस बाद..
तुम बस एक
सोच तक सिमट गयी हो
जो कभी कभी
गुजर जाती है दिमाग से
शकल भी धुंधला गयी है अब तो

सिमट गया है तुम्हारा अस्तित्व
कुछ पन्नों में ..
डायरी के वो पन्ने
जो अब ब्लॉग में बदल गए हैं


सोचता हूँ की कभी
अचानक से तुम मिल जाओ
तो क्या पहचान पाउँगा तुम्हें?
शायद नहीं ...!!

और हाँ ..  देखो …
जी भी रहा हूँ
अच्छे से

कुछ भी तो missing नहीं है

तुम्हारा होना... न होना
अब कोई फरक नहीं डालता
और यही सच्चाई है!!
***************
युगदीप शर्मा (१३ अप्रैल-२०१४ रात्रि/प्रातः २:३६)

Wednesday, April 2, 2014

कुछ बेतुकी बात... !!! (by युगदीप शर्मा)


पिछले बहुत सालों से ..वो कस कर ले रहे थे..
जनता के मजे....
और जनता मस्त थी..चूसने में...
लॉलीपॉप..उनके वादों का...
और हम बैठे बैठे.. हिला रहे थे..अपना
उम्मीदों का झुनझुना..
और खा रहे थे ..पकौड़ियाँ ..
जो की उन्होंने निकाल दीं थीं ..
कच्चे तेल में ही..
हजम तो हमको भी नहीं हुई थी...
कुछ बात...
जो की कर गयी थी..
कब्ज.
पर दोष ले लिया था अपने सर..
पकौड़ों ने..
और उन्होंने थमा दिया था हाथ में...
हमराज चूरन
और अब जनता चाटने में मस्त थी...
उसी चूरन को..
और हम दबा रहे थे... रह रह कर ..
अपने जज्बात
कभी सहला रहे थे अपना ..वही..
कब्जियत वाला पेट..
और नहीं छूटने दे रहे थे..धार..
अपने आंसुओं की..
चूस कर फेंक दिया था उन्होंने ...
जनता को 'आम' समझ कर ..
और जनता निचोड़ने में मस्त थी...
अपनी ही गुठलियाँ ...
और अब हम लेटे-लेटे बजा रहे थे ...
बांसुरी चैन की..
.......
क्यूंकि हम... न 'उन' में से थे...न जनता ही थे..
हम तो थे 'बीच वाले'...
और हाँ...यह तो आप जानते ही होगे...
कि बीच वालों पे...कभी 'उनका' नहीं उठता..
हाथ भी ...
क्यूंकि उनका वही लोग सम्हालते हैं...
हरम..
और पालते हैं फल...उनकी हवस का..
"एक और 'उन' जैसा."..!!!
******************
युगदीप शर्मा (१६ ऑक्टूबर,२०१२)

Saturday, March 8, 2014

लहू का रंग ...!!! (by युगदीप शर्मा)

कभी कभी क्यों लगता है कि..
जिंदगी घिसट रही है..
और  रगों में दौड़ रहा है कुछ..
कुन-कुना पानी..

आज-कल चाय कि दूकान पे-
"छोटू" को आवाज लगाते हुए..
किसी guilt की -
परछाई भी नहीं पड़ती मुझ पे..

ना ही सड़क पे दौड़ते पिल्ले को,
गाड़ियों के बीच से-
हटाने के लिए रुकता हूँ मैं..

आज-कल लोगों से..
अनायास ही 'surname' भी पूछ लेता हूँ
जात-पांत/ ऊँच-नीच/ भेद-भाव..
समाज के अंग लगते हैं अब।

अब ५५ साल के security guard से,
"good morning 'sir'" सुनने में शर्म नहीं आती …
ना ही किसी रिक्शेवाले से ..
5 रुपये के लिए मोलभाव करते बुरा लगता है।

अब गुस्सा नहीं आता…
नेताओं, अफसरों, -
पत्रकारों की बदतमीजियों पे..
ना ही खीझ होती है..

ये सच है..
सब ऐसा ही चलता रहा है
सब ऐसा ही चलता रहेगा
मेरे कुछ उखाड़ लेने से क्या होगा?

तभी तो बदल गया है..
खून का तापमान

कुन-कुना हो गया है अब।

पर हाँ ..कुछ बात है कि..
रंग अभी तक लाल ही है।

ज्यादा दिन नहीं…
सफ़ेद हो जायेगा वो भी !!
************
युगदीप शर्मा(२४ फरवरी एवं ८ मार्च -२०१४)

Sometimes ..it feels like....
life is crawling  ..
What's running in the veins ..
is some lukewarm water ..

Nowadays at the Tea Shops
while shouting at a "Chhotu".(minor)..
i don't even feel
a tiny shadow of guilt

Neither,do i stop to,
save the puppy
running on the road ,
among the fast running vehicles..

Now sometimes Unintended..
i ask peoples their 'surnames'
Racism & Caste-ism / discrimination & Partiality / ..
Now seems a part of society .

these days, in hearing "good morning 'sir'"
from a 55 -year-old security guard ,
i don't feel ashamed at all ...
Neither it feels bad to bargain
with a Rickshaw-puller for 5 bucks .

Now i do not get angry
neither irk on the ...
Politicians and bureaucrats's or -
Journalist's insolence..
 ..

It's true ..
in the same way, it always happened
the same way, it will happen
What I can do....?

that's why temperature
of my blood has changed

it's lukewarm now

however,
The color is still red .

Not for long ...
It will become white too !

Wednesday, April 24, 2013

बाजार.. !!! (by युगदीप शर्मा)


मैं..
निकाल कर रख देता हूँ
सब कुछ ...
अपना ....पराया...
जो कुछ भी है...नहीं है...
मेरे हिस्से के
सपने..
अरमान..महत्वाकांक्षाएं ....
मजबूरियां..
बेबसी...लाचारियाँ..
निकाल देता हूँ सब कुछ .
भूख...प्यास...
गुस्सा ..अपमान ...
इर्ष्या..घृणा
सजा देता हूँ शोकेस में...
किसी मझे हुए सेल्समैन की तरह...
रख देता हूँ सब कुछ...
बाजार में ..

और अंत में...वो  पूछते हैं ..."नया क्या है??"

शायद मैंने  अपने शैतान को नहीं निकाला अब तक...!!!
*************
युगदीप शर्मा (२४ अप्रैल-२०१३)

Wednesday, March 27, 2013

बस एक पल चाहिए..(by युगदीप शर्मा)


जिंदगी की किसी सुनसान सड़क पे,
बस तेरा हाथ पकड़ के , अपने हाथों में,
एक अंतहीन सफ़र पे
चलते चला जाना चाहता हूँ.

या किसी पार्क में किसी पेड़ के नीचे,
कोने की किसी बेंच पे बैठी हुई तुम,
तुम्हारी गोद में रख के सिर
सो जाना चाहता हूँ.

चाहता हूँ कि किसी गम में,
डूबते उतरते हुए भी
तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में हो...
या कि फिर,किसी खुशनुमा माहौल में भी,
तुम्हारे साथ साथ जहाँ की,
खुशियों का जश्न मनाना चाहता हूँ

दूर किसी वादी में, या किसी पहाड़ की चोटी पे,
पीली, चटख, सर्द धूप में,
सुकून के कुछ लम्हे ,
तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूँ.

या किसी, सागर के किनारे,
साहिलों से टकराती हुई
लहरों कि तरह,
टूटती -बिखरती - खिलखिलाती सी तुम्हारी,
हँसीं को, सीने से लगाना चाहता हूँ.

चाहता हूँ कि, सारे रात-दिन
सुबह-शाम, सारे, थम जाएँ वहीँ,
और बस मेरा तुम्हारा साथ हो,
या कि फिर, गुजार जाएँ सभी,
दिन-महीने-साल, जो गुजरना चाहें,
और मैं तुम्हारे सीने पे रख के सिर,
सो जाऊं, एक अनवरत-चिर-खुशनुमा नींद में,
हमेशा हमेशा के लिए.

या अगर , मुमकिन ना हो, इतना सब कुछ,
तो चाहता हु यही,
कि बस इक पल, सुन सकूँ अपना नाम,
तुम्हारे होठों पर, प्यार से,
और फिर,इक उसी पल के सहारे,
सारी जिन्दगी गुजार देना चाहता हूँ.
********************
युगदीप शर्मा (२५ फरवरी-२०१० और ७ मार्च-२०१०)

Wednesday, February 13, 2013

एहसास..!! (by Yugdeep Sharma)

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो नैनों से बतियाना,
वो बलखाना, वो शरमाना,
बिन हिले लबों के चुपके से,
दिल ही दिल में, सब कह जाना.

हाथों में ले हाथ, कभी सकुचाते हुए,
हर आहट पे तेरा सिहर जाना,
तेरा वो हर इक पल, हर इक लम्हा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो नयी सुबह अलसाई सी,
कुछ थकी हुई, घबराई सी,
तेरा वो अंगड़ाई, लेकर उठना,
बिस्तर कि हर सलवट को,
हाथों से ढंकना,

उंगली से लटें
सुलझाते हुए,
दायें ले जाकर, सिर को
हलका सा झटकना,
मुसकाती हुई, तिरछी
नज़रों का फिर इठलाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो अंतिम पल तेरी विदाई का,
तेरी पलकों से आंसूं ढलक आना,
मेरा गुस्सा, बेबसी, लाचारी,
दिल का रोना, होठों का मुसकाना,
साँसों में तूफां सुलगता सा,
वो दर्द अजब सा चुभता सा,
वो, पल में दुनिया-
आँखों में फिर जाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.
**************
युगदीप शर्मा (२५ मई-२०११, रात्रि ९:०० बजे)
correction date: 13/02/2013

बुद्ध..!!! (By Yugdeep Sharma)


याद है? जब पहले पहल मिली थी तुम,
बगल से एक मुस्कान के साथ गुजर गयी थी.
एक परफ्यूम की गंध के साथ
साँस में बस गयी थी तुम
तब ना कोई हवा चली थी,
ना कोई वोइलिन बजी थी.

देखा था मैंने तुझे, पलट कर जरूर,
जैसा कि मैं हर बंदी को देखता था.
क्या पता था कि वही तुम,
एक दिन आ मिलोगी मुझे,
सपने के जैसे, पलकों पे बैठ जाओगी.

दोबारा कब मिले थे, अब ये तो याद नहीं,

पर हाँ, वो एहसास
अभी भी गुदगुदा जाता है अक्सर,
शायद तुमने कुछ कहा था और मैं,
आँखें फाड़ फाड़ के देख रहा था तेरे चहरे को.


फिर जब तुमने फिर से कहा था तो,
हडबडाकर कुछ तो बोला था मैं भी..
और तुम फिर से मुस्कुरा के,
चली गयी थी...फिर से मिलने को..
वो दिन-
उसे तारीख कहूँ तो तौहीन होगी उन लम्हों की ..
-गुजरा नहीं है आज तक...
अटक गया है कहीं...कलेंडरों से परे.


फिर
ना जाने कब.. सब कुछ बदल गया...
आहिस्ते आहिस्ते...
बिना कुछ बोले भी..
जो आज तक कायम है..

बहुत सी बातें...जो तुमने कभी बोलीं ही नहीं..
बरबस ही सुन लिया करता हूँ मैं.
और तुम भी तो समझ लेती हो हर बात को..
अनकहे ही..

भाषा के मायने बदल गए हैं.. शायद...
पंख फैला लिए हैं उसने...
एहसासों को सुनने लगी है वो अब...
आँखों से बतियाती है...
शब्दों/ ध्वनियों की मोहताज नहीं है वो..


तुम्हारे साथ...हर एक पल...
एक जमीनी एहसास है...
बादलों के पार नहीं पहुँचता कभी भी ..
बहुत मजबूत हैं पांव उसके...या कि शायद जड़ें हैं.
जो कहीं गहरे तक, समेटे हुए हैं मुझे..


तेरे साथ होने पर...हर गम, हर ख़ुशी...
अपने मायने बदल देती है...
सब कुछ नया नया सा लगता है..
सारी सृष्टी झूमने लगती है इर्द-गिर्द...
इच्छा/आशा/अभिलाषा/महत्वाकांक्षाओं से परे...
शायद...बुद्ध बन जाता हूँ मैं!!
*********************
युगदीप शर्मा (१३ फरवरी, २०१३)

Wednesday, January 23, 2013

कशमकश..!! (by Yugdeep Sharma)


ये सामाजिक मर्यादाएं,
कैसे तोडूँ, कैसे छोडूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

कर-कर गिनती हार गया मैं,
रिश्तों में इतनी गांठें हैं,
जिनको हम अपना कहते थे,
उन अपनों ने ही ग़म बांटे हैं.
ये रिश्तों की अ-सुलझ गांठें,
कब सुलझाऊं, कैसे खोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

तुमसे पूछा- साथ चलोगी?
उत्तर में फिर प्रश्न मिले,
प्रश्नों को हल करने बैठा,
तो कुछ मुर्दा जश्न मिले.
फिर तुम्ही बताओ इन प्रश्नों का
हल किस पोथी पुस्तक में खोजूं?
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

अब तक चेहरे बहुत पढ़े हैं,
पर तेरे भाव समझ ना पाया,
जितना गहरे उतर के देखा,
उतना घना अँधेरा पाया,
सारे दीपक बुझे पड़े हैं,
मैं किस-किस दीपक को लौ दूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

जीवन में अगणित दुविधाएं,
लंगर डाले पड़ी हुई हैं,
हर ओर घना तूफ़ान मचा है,
जीवन तरणी फंसी हुई है,
फिर इन जीवन झंझावातों में
तुम्ही बताओ क्यूँ ना डोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!
******************
युगदीप शर्मा ( दि०: २३ जनवरी, २०१३)

Thursday, December 13, 2012

खटमल...(by युगदीप शर्मा)


अक्सर रातों को.. नीदों से जाग पड़ता था .
और पाता था ..बहुत से खटमलों को..
खून चूसते हुए....
बहुत बेचैनी होती थी तब...

अब तो आदत पड़ गयी है उनकी...
उनके बिना नींद ही नहीं आती...
---------
शुरू में तो खटमल नहीं थे...
या फिर हमें ही कुछ भान न था...
तब बिस्तर भी पूरा
सुकून-ओ- आराम देता था...

फिर धीरे धीरे उन्होंने अपनी पॉश कालोनियां बना लीं...
वहीँ.... जहाँ कि हमारा बिस्तर भी था..
बिस्तर ...
जिस पर.. हम पैदा होते थे...
पैदा करते थे...
और मर जाते थे...

वहीँ आज कल खटमल भी रहने लगे हैं...
अपने किलों में ....
वहां जहाँ तक कि हम इंसानों कि पहुँच नहीं है ...
पर वो बिना रोक टोक कभी भी
पहुँच सके हैं हम तक...

इधर कुछ दिनों से ... आबादी बढ़ा ली है उन्होंने अपनी..
आज कल तो खुले आम...
दिन दहाड़े भी चूसने लगे हैं खून...

और हम भी सोचते हैं कि...बेचारा...
हमारे खून से ही तो जिन्दा है...
थोड़े से खून में ..क्या बिगड़ जाएगा हमारा...
और फिर...
चलने देते हैं यह रक्त-दान का सिलसिला..
----------
वैसे किसी जरूरत मंद को...
शायद आज तक नहीं दिया...
अपना खून...
क्योंकि वो तो इंसान है...
उसका कमजोर शरीर..अभी भी रखता है
इतनी क्षमता कि..बदल सके
दो टुकड़े रोटी को खून में...

पर बेचारा खटमल तो यह भी नहीं कर सकता...
तभी तो हम उसे दे देते हैं पूरी आजादी...
की वह मनमर्जी तरीकों से
चूस सके हमारा खून...
----------
आज कल तो सुना है कि...
खटमलों ने भी कुछ तरक्की कर ली है..
बना लिए हैं अपने blood-bank ....
आने वाली पीढ़ियों के लिए...

आज-कल वो खून को
आउट-सोर्स भी करने लगे हैं...
यहाँ तक कि सुना है....
कुछ देशों की economy ...
हमारे ही खून से चल रही है..

वहां की खटमल भी...
हमें दुआ देती है....

वाह ..कितने भले लोग हैं हम......
---------
कल अगर...
इंसानों की नस्ल ख़तम हो गयी तब....??
नहीं-नहीं...
खटमल ऐसा नहीं होने देंगे...
उन्हें तो जरूरत है...हमारे जैसे
रेंगते हुए इंसानों की....
दे रखा है उन्होंने हमें अभय-दान ....कि..
"जीते रहो...जिन्दा रहो...बस रेंगते रहो"
***********
युगदीप शर्मा (१७ दिसम्बर, २०१२)


Monday, November 12, 2012

बोल ....फिर कभी दीपक जलाएगा??? (by युगदीप शर्मा)


हा हा हा !!
वह साला ...
दीपक जलाने चला था..

भूल गया था की हमें ..
अंधेरों की लत लग चुकी है...
पर वो... चूतिया था....
समझता ही न था...

वो क्या जानता था कि..
हमारी उजालों से फटती है..
हमें अँधेरा ही पसंद है...

दीपक से आँखें
चकाचौंध होने लगतीं हमारी..
फिर कैसे सो पाते हम....
चैन से ...

तभी तो...उछालने लगे थे कीचड ...
उसके उजले दामन पै...
शायद वह कीचड ही ढक देती
उस रोशनी को....
------------
वो पक्का था....धुन का...
निकला था घर से
'खुद' को जला कर
दीपक जलाने को..

हाथ में माचिस भी थी..

तो उसने शुरू किया
कुछ...शैतान के पुतलों से....
जलाने लगा एक-एक कर
उनके महल...

हम थे....
कि घबराने लगे....
रौशनी देख कर...

उसने सोचा होगा कि..
शैतान को जलाने से...
भगवान् आ खड़े होंगे...
उसके पाले में

पर आज कल ..
चढ़ावा गिन कर decide करते हैं
भगवान् भी...
या कि फिर... अब तक..
पड़ चुकी होगी उन्हें भी शायद
इन अंधेरों की आदत ...

इतनी अंधेर-गर्दी में भी...
वो साला चूतिया....
हम को जगाने चला था..
हा हा हा !!
दीपक जलाने चला था..
-----------
कल बुझा दिया...स्साले का दीपक...
हमेशा हमेशा के लिए...
ताकि...कल फिर कोई चूतिया...
दीपक जलाने कि जुर्रत न कर सके...

हा हा हा !! साला चूतिया...!!
हा हा हा !! हा हा हा !!
*********
युगदीप शर्मा (०९ नवम्बर-२०१२)


hahaha
that moron
wanted to lit a candle..

he forgot...
we are addicted to the dark
but he...surely was an asshole
who refused to understand


didn't he know
we are afraid of light
we love the dark

candle would have
a blinding light
then how would we  continue
our deep sleep

that's why...
we started to blame him
perhaps the shadows
would had covered
his bright costume