Wednesday, February 13, 2013

एहसास..!! (by Yugdeep Sharma)

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो नैनों से बतियाना,
वो बलखाना, वो शरमाना,
बिन हिले लबों के चुपके से,
दिल ही दिल में, सब कह जाना.

हाथों में ले हाथ, कभी सकुचाते हुए,
हर आहट पे तेरा सिहर जाना,
तेरा वो हर इक पल, हर इक लम्हा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो नयी सुबह अलसाई सी,
कुछ थकी हुई, घबराई सी,
तेरा वो अंगड़ाई, लेकर उठना,
बिस्तर कि हर सलवट को,
हाथों से ढंकना,

उंगली से लटें
सुलझाते हुए,
दायें ले जाकर, सिर को
हलका सा झटकना,
मुसकाती हुई, तिरछी
नज़रों का फिर इठलाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

वो अंतिम पल तेरी विदाई का,
तेरी पलकों से आंसूं ढलक आना,
मेरा गुस्सा, बेबसी, लाचारी,
दिल का रोना, होठों का मुसकाना,
साँसों में तूफां सुलगता सा,
वो दर्द अजब सा चुभता सा,
वो, पल में दुनिया-
आँखों में फिर जाना,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.

तेरा वो स्पर्श सुकोमल सुनहरी सा,
मेरे एहसासों में अब तक जिन्दा है.
**************
युगदीप शर्मा (२५ मई-२०११, रात्रि ९:०० बजे)
correction date: 13/02/2013

बुद्ध..!!! (By Yugdeep Sharma)


याद है? जब पहले पहल मिली थी तुम,
बगल से एक मुस्कान के साथ गुजर गयी थी.
एक परफ्यूम की गंध के साथ
साँस में बस गयी थी तुम
तब ना कोई हवा चली थी,
ना कोई वोइलिन बजी थी.

देखा था मैंने तुझे, पलट कर जरूर,
जैसा कि मैं हर बंदी को देखता था.
क्या पता था कि वही तुम,
एक दिन आ मिलोगी मुझे,
सपने के जैसे, पलकों पे बैठ जाओगी.

दोबारा कब मिले थे, अब ये तो याद नहीं,

पर हाँ, वो एहसास
अभी भी गुदगुदा जाता है अक्सर,
शायद तुमने कुछ कहा था और मैं,
आँखें फाड़ फाड़ के देख रहा था तेरे चहरे को.


फिर जब तुमने फिर से कहा था तो,
हडबडाकर कुछ तो बोला था मैं भी..
और तुम फिर से मुस्कुरा के,
चली गयी थी...फिर से मिलने को..
वो दिन-
उसे तारीख कहूँ तो तौहीन होगी उन लम्हों की ..
-गुजरा नहीं है आज तक...
अटक गया है कहीं...कलेंडरों से परे.


फिर
ना जाने कब.. सब कुछ बदल गया...
आहिस्ते आहिस्ते...
बिना कुछ बोले भी..
जो आज तक कायम है..

बहुत सी बातें...जो तुमने कभी बोलीं ही नहीं..
बरबस ही सुन लिया करता हूँ मैं.
और तुम भी तो समझ लेती हो हर बात को..
अनकहे ही..

भाषा के मायने बदल गए हैं.. शायद...
पंख फैला लिए हैं उसने...
एहसासों को सुनने लगी है वो अब...
आँखों से बतियाती है...
शब्दों/ ध्वनियों की मोहताज नहीं है वो..


तुम्हारे साथ...हर एक पल...
एक जमीनी एहसास है...
बादलों के पार नहीं पहुँचता कभी भी ..
बहुत मजबूत हैं पांव उसके...या कि शायद जड़ें हैं.
जो कहीं गहरे तक, समेटे हुए हैं मुझे..


तेरे साथ होने पर...हर गम, हर ख़ुशी...
अपने मायने बदल देती है...
सब कुछ नया नया सा लगता है..
सारी सृष्टी झूमने लगती है इर्द-गिर्द...
इच्छा/आशा/अभिलाषा/महत्वाकांक्षाओं से परे...
शायद...बुद्ध बन जाता हूँ मैं!!
*********************
युगदीप शर्मा (१३ फरवरी, २०१३)

Wednesday, January 23, 2013

कशमकश..!! (by Yugdeep Sharma)


ये सामाजिक मर्यादाएं,
कैसे तोडूँ, कैसे छोडूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

कर-कर गिनती हार गया मैं,
रिश्तों में इतनी गांठें हैं,
जिनको हम अपना कहते थे,
उन अपनों ने ही ग़म बांटे हैं.
ये रिश्तों की अ-सुलझ गांठें,
कब सुलझाऊं, कैसे खोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

तुमसे पूछा- साथ चलोगी?
उत्तर में फिर प्रश्न मिले,
प्रश्नों को हल करने बैठा,
तो कुछ मुर्दा जश्न मिले.
फिर तुम्ही बताओ इन प्रश्नों का
हल किस पोथी पुस्तक में खोजूं?
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

अब तक चेहरे बहुत पढ़े हैं,
पर तेरे भाव समझ ना पाया,
जितना गहरे उतर के देखा,
उतना घना अँधेरा पाया,
सारे दीपक बुझे पड़े हैं,
मैं किस-किस दीपक को लौ दूँ,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!

जीवन में अगणित दुविधाएं,
लंगर डाले पड़ी हुई हैं,
हर ओर घना तूफ़ान मचा है,
जीवन तरणी फंसी हुई है,
फिर इन जीवन झंझावातों में
तुम्ही बताओ क्यूँ ना डोलूं,
माना तुम अच्छी लगती हो,
कैसे कह दूँ, कैसे बोलूँ..!!
******************
युगदीप शर्मा ( दि०: २३ जनवरी, २०१३)

Thursday, December 13, 2012

खटमल...(by युगदीप शर्मा)


अक्सर रातों को.. नीदों से जाग पड़ता था .
और पाता था ..बहुत से खटमलों को..
खून चूसते हुए....
बहुत बेचैनी होती थी तब...

अब तो आदत पड़ गयी है उनकी...
उनके बिना नींद ही नहीं आती...
---------
शुरू में तो खटमल नहीं थे...
या फिर हमें ही कुछ भान न था...
तब बिस्तर भी पूरा
सुकून-ओ- आराम देता था...

फिर धीरे धीरे उन्होंने अपनी पॉश कालोनियां बना लीं...
वहीँ.... जहाँ कि हमारा बिस्तर भी था..
बिस्तर ...
जिस पर.. हम पैदा होते थे...
पैदा करते थे...
और मर जाते थे...

वहीँ आज कल खटमल भी रहने लगे हैं...
अपने किलों में ....
वहां जहाँ तक कि हम इंसानों कि पहुँच नहीं है ...
पर वो बिना रोक टोक कभी भी
पहुँच सके हैं हम तक...

इधर कुछ दिनों से ... आबादी बढ़ा ली है उन्होंने अपनी..
आज कल तो खुले आम...
दिन दहाड़े भी चूसने लगे हैं खून...

और हम भी सोचते हैं कि...बेचारा...
हमारे खून से ही तो जिन्दा है...
थोड़े से खून में ..क्या बिगड़ जाएगा हमारा...
और फिर...
चलने देते हैं यह रक्त-दान का सिलसिला..
----------
वैसे किसी जरूरत मंद को...
शायद आज तक नहीं दिया...
अपना खून...
क्योंकि वो तो इंसान है...
उसका कमजोर शरीर..अभी भी रखता है
इतनी क्षमता कि..बदल सके
दो टुकड़े रोटी को खून में...

पर बेचारा खटमल तो यह भी नहीं कर सकता...
तभी तो हम उसे दे देते हैं पूरी आजादी...
की वह मनमर्जी तरीकों से
चूस सके हमारा खून...
----------
आज कल तो सुना है कि...
खटमलों ने भी कुछ तरक्की कर ली है..
बना लिए हैं अपने blood-bank ....
आने वाली पीढ़ियों के लिए...

आज-कल वो खून को
आउट-सोर्स भी करने लगे हैं...
यहाँ तक कि सुना है....
कुछ देशों की economy ...
हमारे ही खून से चल रही है..

वहां की खटमल भी...
हमें दुआ देती है....

वाह ..कितने भले लोग हैं हम......
---------
कल अगर...
इंसानों की नस्ल ख़तम हो गयी तब....??
नहीं-नहीं...
खटमल ऐसा नहीं होने देंगे...
उन्हें तो जरूरत है...हमारे जैसे
रेंगते हुए इंसानों की....
दे रखा है उन्होंने हमें अभय-दान ....कि..
"जीते रहो...जिन्दा रहो...बस रेंगते रहो"
***********
युगदीप शर्मा (१७ दिसम्बर, २०१२)


Monday, November 12, 2012

बोल ....फिर कभी दीपक जलाएगा??? (by युगदीप शर्मा)


हा हा हा !!
वह साला ...
दीपक जलाने चला था..

भूल गया था की हमें ..
अंधेरों की लत लग चुकी है...
पर वो... चूतिया था....
समझता ही न था...

वो क्या जानता था कि..
हमारी उजालों से फटती है..
हमें अँधेरा ही पसंद है...

दीपक से आँखें
चकाचौंध होने लगतीं हमारी..
फिर कैसे सो पाते हम....
चैन से ...

तभी तो...उछालने लगे थे कीचड ...
उसके उजले दामन पै...
शायद वह कीचड ही ढक देती
उस रोशनी को....
------------
वो पक्का था....धुन का...
निकला था घर से
'खुद' को जला कर
दीपक जलाने को..

हाथ में माचिस भी थी..

तो उसने शुरू किया
कुछ...शैतान के पुतलों से....
जलाने लगा एक-एक कर
उनके महल...

हम थे....
कि घबराने लगे....
रौशनी देख कर...

उसने सोचा होगा कि..
शैतान को जलाने से...
भगवान् आ खड़े होंगे...
उसके पाले में

पर आज कल ..
चढ़ावा गिन कर decide करते हैं
भगवान् भी...
या कि फिर... अब तक..
पड़ चुकी होगी उन्हें भी शायद
इन अंधेरों की आदत ...

इतनी अंधेर-गर्दी में भी...
वो साला चूतिया....
हम को जगाने चला था..
हा हा हा !!
दीपक जलाने चला था..
-----------
कल बुझा दिया...स्साले का दीपक...
हमेशा हमेशा के लिए...
ताकि...कल फिर कोई चूतिया...
दीपक जलाने कि जुर्रत न कर सके...

हा हा हा !! साला चूतिया...!!
हा हा हा !! हा हा हा !!
*********
युगदीप शर्मा (०९ नवम्बर-२०१२)


hahaha
that moron
wanted to lit a candle..

he forgot...
we are addicted to the dark
but he...surely was an asshole
who refused to understand


didn't he know
we are afraid of light
we love the dark

candle would have
a blinding light
then how would we  continue
our deep sleep

that's why...
we started to blame him
perhaps the shadows
would had covered
his bright costume






Monday, October 29, 2012

अनवरत...!!! (by युगदीप शर्मा)


मैं तुझे समेटे रखता हूँ समंदर के जैसे
पर कुछ लम्हों की भाप उड़ ही जाती है
कहीं नजर छुपा कर
और दौड़ने लगती है बादलों की तरह

और फिर
इसी तरह निकल पड़ते हैं
कुछ धूप-छाँव के सिलसिले
जिन पर कभी-कभी कुछ
शामें ठहर जाया करती हैं

चंद पलकों के धुंधलके
जम जाते हैं
एक सर्द रात की शक्ल में
तब जिंदगी किसी ग्लेशिअर में
रुकी बर्फ की तरह सर्द लगने लगती है

फिर कभी जब तेरी
यादों की धूप में
पिघलने लगती है
तो लेने लगती है नदी का रूप

इसीलिए फिर खुद को
समेटने लगता हूँ
एक बाँध की तरह
पर तू
न जाने कहाँ से निकल पड़ती है

रास्ते में कहीं उफन पड़ती है
बारिशों के साथ मिलकर
बहा ले जाने मुझे

और अंत में जा मिलती है
समंदर से ही

और
यही सिलसिला
चलता आ रहा है
अनंत काल से
अनवरत ...
*************
युगदीप शर्मा (२५ अक्टूबर, २०१२)

(English Translation )
I...Like an Ocean..,
try to contain you,
but steams of few moments...
blow away..
stealing my eyes ....
And starts to run like clouds ....

And then starts a play...
of some sun and shadows ..
on which occasionally ,..
some Evenings used to rest.....

freeze like a chilled night ....
some Twilight Eyes...
And then,
as a cold Glacier ice..
life seems to be deposited

and, When...
Starts melting it again...
the sun of your memories...

takes place there ...a river

So,I starts winding up
sometimes like a dam..
but, again...out of nowhere ...
you emerge

and start conspiring,
with pouring rain..
to flood me out,
and blow me away...

And, merge in the ocean ...
you again ....and finally...
And this.. consecution ..
's been going on ...

from eternity ....
continuously ...
ceaselessly.....
**************
Yugdeep Sharma (25 October, 2012)

Thursday, October 18, 2012

अहिंसक क्रांति की जरूरत !!


      एक समाज या फिर देश के उत्थान के लिए एक सतत संघर्ष की जरूरत होती है. वह संघर्ष कैसा भी हो सकता है, वह हिंसक भी हो सकता है या फिर अहिंसक भी. इस संघर्ष की दिशा बहुत कुछ समाज, देश, काल और परिस्थितियों पर नर्भर करती है. साथ ही संघर्ष हमेशा बलिदान भी मांगता है. और आगे चल कर यह बलिदान ही उस संघर्ष की सततता, उद्देश्य और सम्पूर्णता में सहायक होता है.

       बहुत अच्छा तो यह हो कि हम बिना उस संघर्ष से गुजरे अपने लक्ष्य को पा सकें, परन्तु आज की परस्थितियों को देखते हुए यह एक असंभव सी बात लगती है.

      ऐसा नहीं है कि भारत में संघर्ष नहीं चल रहा है, संघर्ष चल रहा है, सतत भी है, परन्तु वह दिशा-हीन है. संघर्ष के बहुत से छोटे छोटे टापू जैसे बन गए हैं. हर किसी का अपना एक उद्देश्य है, अपना अपना एक तरीका है. जरूरत है तो उनको एक साथ लाने की. और उन सब को साथ लाने के लिए एक उत्प्रेरक कि आवश्यकता है. लोगों का यह प्रश्न कि "should we not be able to think for ourselves and vote out the corrupts" सही है..लेकिन इन अलग अलग टापुओं कि जड़ में भी यही है कि हर कोई (जो भी थोडा बहुत समझदार है ) अपनी अलग डफली लेकर अपना अलग ही राग बजा रहा है.

       भारत कि बहुसंख्यक जनता को अभी भी इन सब बातों से कोई लेना देना नहीं है. वो अभी भी जाति, धर्म और क्षेत्र के संघर्षों में उलझी हुई है. उन लोगों को साथ लाने के लिए भी उसी उत्प्रेरक कि आवश्यकता है, या कहें कि एक ऐसे नेतृत्व कि आवश्यकता है जिसका वो अन्धानुकरण कर सकें.(स्वंत्रता के आन्दोलन में इसी उत्प्रेरक का नाम "महात्मा गाँधी" था). परन्तु  विडम्बना यही है कि लोग तो अनुकरण (अन्धानुकरण) कर रहे हैं पर वह नेतृत्व अनुकरणीय नहीं है.

       यह सही है कि भारत एक गृह-युद्ध को झेलने लायक अवस्था में नहीं है, परन्तु वह अनेकों प्रकार के संघर्ष तो पहले से ही झेल रहा है. चाहे वह आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, या फिर पूर्वोत्तर का जनजातीय संघर्ष, चाहे वह सिख दंगों कि शक्ल में हो या हिन्दू-मुस्लिम दंगों कि शक्ल में, चाहे वह झारखंड मुक्ति संघर्ष हो या तेलंगाना, या फिर उत्तर-प्रदेश का जिलों कि सीमाओं को लेकर संघर्ष.
     
        तब क्यों नहीं इन सभी संघर्षों को एक नया आयाम देते हुए, सबको समग्र रूप में करते हुए, केवल एक उद्देश्य के लिए, केवल एक संघर्ष का रूप दें, जो कि एक नए भारत का निर्माण हो, नए समाज का निर्माण हो. इसके लिए किसी नए संघर्ष को जन्म देने की जरूरत नहीं है. जरूरत है बस एक समर्थ नेतृत्व देने की, और एक सही दिशा देने की.

(यहाँ मैं यह बात जोड़ना चाहूँगा की मैं हिंसा का कतई पक्षधर नहीं हूँ और मेरे आदर्श गाँधी जी और विवेकानंद जी हैं. और भारत को भी उन्ही के बताये मार्ग पर चलते हुए एक व्यापक अहिंसक क्रांति की जरूरत है... और जो लोग गाँधी जी के मार्ग से असहमत हैं उन्हें मैं 'हिन्द-स्वराज्य ' पढने की सलाह दूंगा.)
********************

युगदीप शर्मा- दि०-१८/१०/१२
(बकर-अड्डा के फेसबुक पर पूछे गए प्रश्न के जवाब में:
Do we really need an outside catalyst to 'awaken' us or should we not be able to think for ourselves and vote out the corrupts?
Can India afford a civil war at this point of time?)

Monday, October 1, 2012

बारिश!!! (by युगदीप शर्मा)


(You can see the English translation below:)

बहुत बारिश हो रही है बाहर..
और वो बैठे , हाथों में जाम लेकर,
शायराना अंदाज में, पकौड़ियाँ खा रहे होंगे..

पर आज.. बहुत से घरों के बाहर बैठे कुत्ते,
भूखे ही भौंकते रहेंगे!
वो घर जिन्हें डीजल से.. या
रसोई गैस से कभी साबका
नहीं पड़ा.. आज तक!

वो घर, जिनके लिए.. जंगल से बीनी
लकडियाँ भी गीली हो गयीं...और

आज वो लोग बना रहे होंगे
उस सीली हुई लकड़ी के,
धुंए में ही रोटी की शक्लें.

और शायद उन्ही रोटियों को,
अपने दीदों* से निकलती,
बारिशों के साथ निगल कर ,
सो रहेंगे..अगली सुबह तक
टपकती छत से बेखबर !!

और..उधर वो अपनी खुमारियों
का जश्न मना रहे होंगे...
शायद..मुद्रास्फीति की दर को
घटा-बढ़ा रहे होंगे !!!

*दीदे = आँखें (शायद यह शब्द बृज-भाषा में 'दीदार' शब्द से आया होगा कभी.. )
*************
युगदीप शर्मा (१ अक्टूबर- २०१२ ई० प्रातः १:४८ बजे)


English Translation:
---------------------
Rain..!!! (by Yugdeep Sharma)

It's raining heavily.. outside..
And they would be sitting,
having wine in their hands,
must be eating dumplings ..

but, Today the dogs sitting outside..
those houses,
will bark in hunger!

The houses, who never.. ever had
came to know about,
diesel or LPG!

the houses, for whom,
the timber collected from woods
became too wet ...to light their stoves..

They would be making ​​today
the faces of the breads
in the fumes/smoke..
from that wet wood;

And maybe... ;
they will swallow..those loaves
with the rain ..
Emanating from their eyes
and will sleep..
until the next morning
Regardless of leaky roofs!!

And there...
they must have been celebrating ..
their hangover...
playing with the Inflation rate!!!
**************
Yugdeep Sharma (1-oct,2012, @ 1:48 am)


Friday, September 28, 2012

वो भी एक दिन था...(by युगदीप शर्मा )


तेर गेसुओं के, घने साए में,
सिर छुपा कर,
जहाँ भूल जाना,

तेरी आँखों में छिपी,
शरारत को पाकर,
दिल का मचल जाना,

तेरे उन सुकोमल-
सुवासित अधरों से,
हँसीं का छलक आना,

तेरी आँखों में खोया-खोया,
मेरा खुद को भूल जाना,

वो सिलसिला,
मिलने मिलाने का,
जमाने से छुप कर,

और हलकी सी आहट पर,
तेरा सिहर जाना,

बंद आँखों से तेरी,
सूरत का दिखना,

खुली आँखों में तेरे,
सपनों का आना,
-------------------
वो भी इक दिन था,
यह भी इक दिन है,
तनहा अकेला सा,
दिल तेरे बिन है,

ना तेरी सूरत,
ना तेरे गेसू,
अब तो ख्वाब का ,
आना जाना भी कम है,

चाहे खुली हों, या
बंद हों मेरी आँखें,
तेरी याद में अब तो
हर पल ही नाम हैं.

तेरी वो हँसीं,
तेरी वो शरारत,
बस उन्हीं यादों में,
खोये-खोये से हम हैं...
खोये-खोये से हम हैं...
खोये-खोये से हम हैं...!!!
************
युगदीप शर्मा (२३ फरवरी-२०११, सां०  ५:३०)

Thursday, September 27, 2012

क़ाश..... (by युगदीप शर्मा)


कभी तूफां में टूट के , बिखरना भी पड़ता है।
सागर की हर कश्ती की, मंजिल नहीं होती।

ख्वाबों में मुलाक़ात भी, अच्छी है मेरे दोस्त।
इंसान की हर मुराद कभी, पूरी नहीं होती।

आज फिर चौराहे पे खड़ा, है इक मुसाफ़िर।
जाने पूरी क्यूँ उसकी, फ़रियाद नहीं होती।

इस दर्द-ए-दिल का इलाज क्या, बतलायेगा कोई।
यह मर्ज़ ऐसा है जिसकी कोई, मियाद नहीं होती।

आज फिर से बैठा हूँ, यह सोचता हूँ मैं।
तू जो होती-काश-मेरी जिन्दगी , यूँ बरबाद नहीं होती।

डोर मुहब्बत की जो, मजबूत होती ग़र।
तू मेरी यादों से यूँ, आज़ाद नहीं होती।

आँधी में चरांगाँ जो, साथ न छोड़ता अगर।
तो आज अँधेरों से ये बस्ती, आबाद नहीं होती।

गर तेरी बेवफ़ाई का, मालूम होता मुझे।
तो शायद ये मेरी हालात ,तेरे बाद नहीं होती।

क़ाश होता यूँ की दिल, धड़कता ना कोई।
नज़रें ना मिलतीं कभी, और कोई याद नहीं होती।
************
युगदीप शर्मा - Year 2011