Friday, March 11, 2016

एक और खत तेरे नाम...!!!

चल कुछ ऐसा करते हैं,
हम दोनों दुनिया से बेखबर,
निकल चलते हैं कहीं,
दूर कहीं

जहाँ गम के साये ना हों,
कोई परेशानी कोई झंझट न हो

दूर कहीं

साये तेरी जुल्फों के
ओढ़ कर सो रहूँ मैं

तेरे जिस्म की सौंधी सी महक
समां जाये मुझमें

तेरे होठों का नम एहसास
मेरे होठों पे

और हो
सिर्फ तेरी आँखों के
मदहोश प्याले,
और मैं

बस  इतना ही

चल कुछ ऐसा करते हैं,
हम दोनों दुनिया से बेखबर,
निकल चलते हैं कहीं,
दूर कहीं  ...

दूर कहीं  ...
****
युगदीप शर्मा (दिनांक १६ सितम्बर २०१५, स्लोवाकिया में)

तुम्हें पता है?

तुम्हें पता है?
आज कल रातों में सोते जागते,
फ़ोन के हर विब्रेटेड नोटिफिकेशन पे
मेरा हाथ खुद ही चला जाता है फ़ोन तक,
हर पल एक ही ललक
कि शायद- मैसेज तुम्हारा हो।

कभी कभी
घुप्प अंधेरे में भी
छत पे तुम्हारा चेहरा जगमगा जाता है
और उस पर हलकी सी हंसी का एहसास
महका जाता है मेरी साँसें।

लगता है
कैद कर लूँ उन लम्हात को
अपने सीने में कहीं
जहाँ हर रोज
तन्हाई में भी
उतर के एक बार
जी लिया करूँगा सदियाँ

पता है ?
तुमसे अलग रहने का एहसास
सच में जानलेवा लगता है।
******
युगदीप शर्मा (दिनांक ५ नवम्बर २०१५, स्लोवाकिया में)

कल्पना...!!!

कभी सपनो में मिला करता था
हर रोज तुमसे
तुम मेरी कल्पना के रंगों से भरी हुई
कोई पेंटिंग हुआ करती थीं।
पर वास्तविकता में मेने जाना कि
हकीकत के सामने कल्पना के रंग फीके होते हैं।

तुम मेरी कल्पना का
 एक उपन्यास हुआ करती थीं।
जो हर शब्द के साथ साथ
हजारों भावों में डुबाती उतारती रहती थी।
पर फिर गलत था शायद मैं
तुम तो वह महा काव्य हो।
जिसे कालिदास भी रच नहीं पाते।

तुम जो कभी मेरे ख्वाबों में
संगेमरमर की मूरत हुआ करती थीं।
जिस मूरत के वशीभूत
हर रोज कुछ लिखा गाया करता था।
पर अब जाना है
तुम तो मेरा मंदिर हो।
सजीव सगुण।

हे प्रिये।

मेरा सर्वस्व निछावर
तुम पर।।

*****
युगदीप शर्मा (१६ फ़रवरी २०१६, सायं ७:४० बजे)

अभिजात्यता का आइना

भिखारियों की लाइन,
रिक्शे-वाले, ऑटो वाले लोग,
कचरे के ढेर से
प्लास्टिक छंटते लोग।

फुटपाथ पे या
झुग्गियों  में रहते लोग

मजदूर,  या
कूड़ा कचरा उठाते लोग,

लोग
जो मेयर को दिखाने
२ फुट की सीवर लाइन में,
२ किलोमीटर दूर जाके
बाहर निकलते हैं,,

लोग
जो जनरल कम्पार्टमेंट में
विद फैमिली, पंद्रह सौ किलोमीटर सफ़र करते हैं…

लोग
जो बस में खिड़की
खोलने या बंद करने पर लड़ते मरते हैं

या  रेलवे टिकट की लाइन में लगे हुए लोग

मेरी अभिजात्यता को आइना दिखाते
इन लोगों से सच में घृणा होती!!

****
युगदीप शर्मा (७ मार्च २०१४, फाइनल ड्राफ्ट १७ फ़रवरी, 2016)

Wednesday, February 17, 2016

बस...!!!

वो अलसायी हुई सुबह
और तेरा उठना
कुछ कुनमुनाते हुए

अनावृत उरोजों पै
ढलकते गेसू
सांसों में बसी रात की खुशबू

अधखुली आँखें
मिचमिचाते हुए,
अंगड़ाई लेती हुई तुम

बिस्तर की सलवटें
बेतरतीब तकिये
बिखरे हुए कपड़े

परदे की झिर्रियों से
छनती धूप
धूप से धुला
तांबे सा बदन

तेरे साये को
आकार देती रेखाएं
गुम होती हुई
तेरे बदन में कहीं

अधरों के किनारों पे
एक नन्ही हंसी
तेरी कोमल सी बाँहें
और बांहों के सिरों पर मैं

बस...!!!

*****
युगदीप शर्मा (१७ फरवरी २०१६, प्रातः १०:५० बजे ) 

Tuesday, February 9, 2016

रूठना ..मनाना.. !!

ये कातिल अदाएं,
ये तेरा मुस्कुराना,
दिल पे खंजर चलाये,
ये तेरा रूठ जाना।

तेरे होठों की लाली,
मेरी आँखों का सपना,
मैं इंतजार में हूँ,
कब कहूँ इनको अपना।

तुम्हारी नजर में,
मेरा अक्स आये,
उस लम्हे को देदो,
भले मेरी जान जाये।

मेरी जान हो तुम,
जो यूँ रूठ जाओगे,
कसम से खुद की,
मुझे जीता न पाओगे।
******
युगदीप शर्मा (८ फ़रवरी, २०१६ रात्रि १२.०० बजे )

Tuesday, December 8, 2015

इनविजिबल लोग ...!!!

हर रोज ऑफिस आते जाते
कुछ इनविजिबल लोगों से
सामना होता है।

चमचमाते हुई इमारतों पे
रस्सियों से लटकते
कुछ बैग चेक करते
या फिर होउस्कीपिंग ही।


कभी कभी आते जाते रास्तों में
ट्रैफिक में फंसा बछडा भी आ जाता है
गाड़ी के सामने।


कभी कभी दिख जाते हैं
कुछ गंवार लोग भी
बेतरतीब से
लंच टाइम में किसी नजदीकी
अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग से निकलते
या हाइवे को दौड़ कर पार करते।

या कि फिर बालकोनी में बैठे कबूतर ही।

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डर लगता है
गलती से भी कभी गर
आँखों में झाँक लिया उनके

या कभी उन इनविजिबल लोगों से
प्रकाश परावर्तित होने लगा तो?

डर लगता है
मेरी सभ्यता नंगी ना हो जाये उस दिन।
***
युगदीप शर्मा

( दि० २ सितम्बर, रात्रि ९.५३ बजे स्लोवाकिया में)

Sunday, November 1, 2015

भूख और स्वाभिमान...!!!

"वो एक बेचारा भूख से मर गया"
"नहीं नहीं स्वाभिमान से मरा है…
भूख से कोई नहीं मरता"
"आदमी भूख से नहीं मरता ?"
"नहीं... स्वाभिमान से मरता है"
"हाथ फैला सकता था किसी के आगे
पर नहीं ..
मर गया ..
चोरी कर सकता था "
"अगर पकड़ा जाता तो? "
"तो पिटाई से मरता
भूख से नहीं "

"खैर छोड़ो..
आज डिनर का क्या प्रोग्राम है?"
"फोर सीजन्स चलें क्या? वहां San-Qi का खाना अच्छा है !"
************
युगदीप शर्मा (दिनांक १५ मार्च २०१४)

Thursday, September 3, 2015

फिर चलता हूँ...!!! (by युगदीप शर्मा)

फिर चलता हूँ...!!

कुछ अपनों से
कुछ सपनों से
थोड़ा बतिया लूँ,
फिर चलता हूँ.
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

बहुत दिनों से
दौड़ रहा था
लक्ष्य हीन सा
बेफिकरा सा
सपनों के
टूटे रेशों से
फुरसत के कुछ
पल बुनता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ

जीवन की
आपा धापी में
जाने कितने
पीछे छूटे
जिनके बिन था
जीना मुश्किल
ऐसे कितने नाते टूटे

उन रिश्तों को
उन नातों को
उन लम्हों और
उन यादों को
कण- कण सँजो लूँ
फिर चलता हूँ
कुछ पल सुस्ता लूँ
फिर चलता हूँ
****************
युगदीप शर्मा (३-४ अगस्त रात्रि १२ बजे २०१४) (फाइनल ड्राफ्ट ३ सितम्बर २०१५ प्रातः ९.३० बजे, स्लोवाकिया में)

Thursday, April 9, 2015

मौसमों के मायने...!!!(by युगदीप शर्मा)

लोग
जिनके लिए बरसात की रातें
रूमानी नहीं होतीं।

लोग
जिनके लिए बरसात का मतलब
टपकती छतों या गीली लकड़ियों से बढ़ कर
कुछ नहीं होता।

लोग
जो काट देते हैं रातें
टांगों के बीच बाल्टी रख
छतों से टपकता सैलाब कैद करने को
और सो जाते हैं बेखबर
बिस्तर के उस एक कोने पर
जो कम गीला है।

लोग
जिनके लिए सर्दियों का मतलब
उन शूलों से है
जो
कम्बलों और गूदड़ियों के
छेदों से निकल
भेदते रहते हैं उनके कंकाल

लोग
जिनका हर दिन,
रात काटने की तैयारियों में
और रातें
दिन की उम्मीद में गुजरती हैं

उनकी सर्दियां गुलाबी नहीं
स्याह होती हैं।

लोग
जो हमारे अन्नदाता हैं
जिनके बनाये लत्ते पहन,
जिनकी बिछायी छतों की छाँव में
हम जिनके भाग्यविधाता होने का
दम्भ भरते हैं।

उन लोगों को
लू के थपेड़े सच में बहुत राहत देते हैं।
*****************
युगदीप शर्मा (दिनाँक- १५/१६ मार्च २०१५ रात्रि १२.११ बजे ) (फाइनल ड्राफ्ट - ८/९ अप्रैल २०१५ रात्रि १:४० बजे)